रमेश भान सेनयी दिल्ली , फरवरी 23 -- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 'रणनीतिक साझेदारी' को और आगे बढ़ाने के लिए 25-26 फरवरी को इजरायल का दौरा करेंगे और इस दौरान रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और साइबर सुरक्षा पर द्विपक्षीय बैठकों में चर्चा की जायेगी।

श्री मोदी का यह दूसरा इजरायल का दौरा होगा। इससे पहले वह जुलाई 2017 में इजरायल गये थे। पिछले दौरे पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने व्यक्तिगत रूप से श्री मोदी का स्वागत किया था। कई आलोचकों की राय है कि इजरायल के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकी इस्लामिक दुनिया या फ़िलिस्तीन-विरोधी सोच का प्रतीक है। मिसाल के तौर पर, अल जज़ीरा ने 23 फरवरी को प्रकाशित एक लेख में कहा है कि श्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने इजरायली नेता बेंजामिन नेतन्याहू के करीब आने के लिए फिलिस्तीन के लिये अपना लंबे समय से चला आ रहा समर्थन कमज़ोर किया है।

अल जज़ीरा ने नयी दिल्ली स्थित थिंक टैंक पॉलिसी पर्सपेक्टिव्स फाउंडेशन के एक वरिष्ठ फेलो के हवाले से कहा है, " भारत के तथाकथित यथार्थवादी रुख ने उसकी वह नैतिक शक्ति छीन ली है। फिलिस्तीनी क्षेत्रों में जारी युद्ध के बीच श्री मोदी की इज़रायल यात्रा 'इज़रायली राज्य की नरसंहार की नीति 'को वैधता देने के समान है।"प्रधानमंत्री मोदी की इज़रायल यात्रा का विश्लेषण भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक जटिल समस्याओं के प्रति उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, जहां अधिकांश देश और नेता किसी न किसी पक्ष में खड़े हो जाते हैं।

अल जज़ीरा के लेख में यह कहना, "भारत के तथाकथित यथार्थवादी रुख ने उसकी नैतिक शक्ति समाप्त कर दी है और मोदी की यात्रा "इज़रायली राज्य की नरसंहार की नीति 'को वैधता देने के समान है। यह किसी भी तरह से वस्तुनिष्ठ टिप्पणी नहीं कही जा सकती, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संबंध ' या तो मेरी बात मानो नहीं तो अपने रास्ते पर जाओ'जैसी सोच पर आधारित नहीं होते।

श्री मोदी बार-बार यह संकेत दे चुके हैं कि भारत एक 'डी-हाइफेनेटेड 'विदेश नीति अपनाता है जिसमें एक ही मुद्दे से जुड़े पक्षों से अलग अलग तरीकों से निपटा जाता है। इसमें भारत के इज़रायल और फिलिस्तीन के साथ उसके संबंध एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से संचालित होते हैं, जैसा कि अधिकांश देश करते हैं। किसी एक देश के साथ संबंधों को दूसरे देश के साथ संबंधों से नहीं जोड़ा जाता।

प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा से कुछ दिन पहले भारत ने भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी की, जिसमें एक संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य के समर्थन को स्पष्ट रूप से दोहराया गया और गाजा के पुनर्निर्माण में योगदान पर चर्चा की गई। प्रधानमंत्री ने 31 जनवरी को अरब देशों के विदेश मंत्रियों, अरब लीग के महासचिव और अरब प्रतिनिधिमंडलों के प्रमुखों से मुलाकात की, जो दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भारत आए थे।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और अरब जगत के बीच गहरे और ऐतिहासिक जन-जन संबंधों को रेखांकित किया, जिन्होंने वर्षों से दोनों पक्षों के रिश्तों को प्रेरित और मजबूत किया है। उन्होंने आने वाले वर्षों के लिए भारत-अरब साझेदारी का अपना दृष्टिकोण साझा किया और व्यापार , निवेश, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा तथा अन्य प्राथमिक क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने की भारत की प्रतिबद्धता दोहरायी।

विदेश मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री ने फिलिस्तीन के लोगों के प्रति भारत के निरंतर समर्थन को भी दोहराया और गाजा शांति योजना सहित चल रहे शांति प्रयासों का स्वागत किया। उन्होंने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए अरब लीग की महत्वपूर्ण भूमिका की भी सराहना की।

इसके अलावा, भारत हाल ही में पश्चिमी तट में इज़रायली बस्तियों के विस्तार की आलोचना करने वाले संयुक्त राष्ट्र के एक बयान से भी जुड़ा, जो दर्शाता है कि इज़रायल के साथ उसके रणनीतिक संबंधों का अर्थ सभी इज़राइली कार्रवाइयों का बिना शर्त समर्थन नहीं है।

दूसरी ओर, इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) अक्सर कश्मीर के तथाकथित आत्मनिर्णय के समर्थन और भारत में अल्पसंख्यकों के कथित व्यवहार की आलोचना करते हुए प्रस्ताव पारित करता है। ये प्रस्ताव तथ्यों की पुष्टि किए बिना पारित किए जाते हैं। भारत लगातार इन्हें "तथ्यात्मक रूप से गलत" और "आंतरिक मामले" बताते हुए खारिज करता रहा है और ओआईसी पर पाकिस्तानी प्रचार का मंच बनने का आरोप लगाता है।

हालांकि ओआईसी की बयानबाजी के बावजूद, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख मुस्लिम-बहुल देशों ने भारत के साथ आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को उल्लेखनीय रूप से मजबूत किया है और अक्सर सामूहिक ओआईसी रुख से कहीं अधिक संतुलित बयान देते हैं।

इसलिए, अहम प्रश्न यह है कि क्या भारत की इज़रायल नीति व्यावहारिक है। भारत हमेशा से कहता रहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हित और अपने 1.4 अरब नागरिकों के हित में कार्य करता है।

इज़रायल भारत के लिए उच्च स्तरीय सैन्य प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसका वार्षिक मूल्य लगभग एक से दो अरब अमेरिकी डॉलर आंका जाता है, और उसने 1999 के कारगिल युद्ध जैसे संघर्षों के दौरान भारत को अहम सहयोग प्रदान किया था।

स्वतंत्र विदेश नीति भारत को इज़राइली नवाचार का लाभ उठाने के साथ-साथ सभी देशों का मित्र बने रहने की अनुमति देती है, जिसके चलते भारत आई2यू2 (भारत-इज़राइल-यूएई-अमेरिका) जैसे क्षेत्रीय समूहों का हिस्सा बना है।

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) जैसी परियोजनाओं के लिए भी इज़रायल और अरब देशों-दोनों के साथ संबंध बनाए रखना आवश्यक है। इज़रायल के प्रधानमंत्री ने भी भारत और इज़रायल के संबंधों को "दो वैश्विक नेताओं के बीच एक शक्तिशाली गठबंधन" बताया है।

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