मुंगेली , फरवरी 28 -- छत्तीसगढ में कलेक्ट्रेट मुंगेली के पर्यावरण अधोसंरचना विकास उपकर मद से जुड़े शासकीय बैंक खाते में 26 लाख 87 हजार रुपये के संदिग्ध लेनदेन का मामला अब प्रशासनिक स्तर पर गंभीर जांच का विषय बन गया है।

जिला कलेक्टर कुंदन कुमार ने स्वयं इस प्रकरण का संज्ञान लेते हुए इसे संभावित वित्तीय धोखाधड़ी की श्रेणी में माना है और स्पष्ट किया है कि शासकीय खाते से बिना विधिवत अनुमति किसी भी प्रकार की राशि का निजी खाते में स्थानांतरण गंभीर अनियमितता है।

यह खाता सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, शाखा मुंगेली में संचालित था। मामले के उजागर होने के बाद जिला प्रशासन ने बैंक प्रबंधन से विस्तृत स्पष्टीकरण और लेनदेन से संबंधित संपूर्ण दस्तावेज तलब किए हैं।

कलेक्टर ने कहा कि "राशि लौटाना समाधान नहीं, प्रक्रिया की जवाबदेही जरूरी" । उन्होंने कहा कि बाद में राशि खाते में वापस जमा करा देना इस मामले को हल्का नहीं करता। मूल प्रश्न यह है कि लगभग 27 लाख रुपये का लेनदेन खाताधारक की जानकारी और अनुमति के बिना कैसे संभव हुआ। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार तीन बड़े लेनदेन करीब नौ लाख, आठ लाख और लगभग छह लाख रुपये के किए गए, जबकि बैंक रिकॉर्ड में कुल छह लेनदेन दर्ज बताए जा रहे हैं।

कलेक्टर ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि इतनी बड़ी रकम के हस्तांतरण में शाखा प्रबंधक की अधिकृत आईडी का उपयोग आवश्यक होता है। ऐसे में किसी एक कर्मचारी द्वारा, वह भी कथित रूप से "लंच टाइम" के दौरान, इस तरह की प्रक्रिया पूरी कर लेना कई सवाल खड़े करता है। प्रशासन का मत है कि जिम्मेदारी केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि प्रणालीगत जांच जरूरी है।

जानकारी के अनुसार यह खाता अपर कलेक्टर जी.एल. यादव के प्रभार में अधोसंरचना मद के अंतर्गत संचालित था और संबंधित राशि वर्ष 2019-20 की बताई जा रही है। वित्त विभाग के निर्देशानुसार राशि को शासकीय खजाने में जमा कराने की प्रक्रिया के दौरान जब ई-केवाईसी किया गया, तब लेनदेन की विसंगतियां सामने आईं।

प्रशासन का सीधा प्रश्न है कि यदि खाताधारक को इस प्रकार के लेनदेन की कोई सूचना नहीं थी, तो बैंकिंग निगरानी प्रणाली में किस स्तर पर चूक हुई। बैंक की ओर से फिलहाल संबंधित कर्मचारी के निलंबन की जानकारी दी गई है, किंतु प्रशासन इसे पर्याप्त जवाब नहीं मान रहा।

सूत्रों के मुताबिक मामले की जांच अब सर्तकता टीम के स्तर पर की जा रही है। प्रशासन द्वारा मांगे गए पूर्ण स्टेटमेंट और आवश्यक दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं कराए जाने को भी गंभीरता से लिया गया है। कलेक्टर ने संकेत दिए हैं कि यदि जांच में लापरवाही या मिलीभगत प्रमाणित होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर प्रशासनिक ही नहीं, कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित