प्रयागराज , जनवरी 31 -- उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में लगे माघ मेला के चौथे स्नान पर्व माघी पूर्णिमा के मौके पर गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी पर रविवार को संगम स्नान और दान-पुण्य के लिए लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। इस माघी पूर्णिमा पर ग्रहों और नक्षत्रों के दुर्लभ संयोग और चन्द्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ने से संगम स्नान और दान-पुण्य का महत्व कई गुना बढ़ गया है। माघ पूर्णिमा के स्नान पर्व के साथ ही संगम की रेती पर लगने वाले माघ मेले में पिछले एक महीने से रह रहे श्रद्धालुओं का कल्पवास भी पूरा हो जाता है और कल्पवासी यहाँ कमाए गए पुण्य और आनंद की सुखद अनुभूति के साथ अपने-अपने घरों को रवाना होने लगते हैं।

मोक्ष के देवता भगवान् विष्णु के सानिध्य में प्रयागराज के संगम में आस्था की एक डुबकी लगाकर पुण्य कमाने का जो सिलसिला देर रात शुरू हुआ, वह सुबह सूरज की तपिश के साथ लाखों श्रद्धालुओं के सैलाब में तब्दील होता गया। त्रिवेणी के तट पर हर तरफ़ श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आती हैं।कहीं तिल रखने की भी जगह नही हर कोई आस्था की एक डुबकी लगाने को उतावला है।

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक पूर्णिमा माघ मॉस का सबसे पवित्र और शुभ दिन माना जाता है। कहा जाता है कि पूर्णिमा पर संगम स्नान करने वाले को एक अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है। इसीलिए संगम के तट पर भगवान् भाष्कर को अर्ध्य देकर आस्था की डुबकी लगाने से पहले कोई हवन कर रहा होता है तो कोई मंत्रों का जाप श्रद्धालु दिल खोलकर दान-पुण्य भी कर रहे हैं। माघ पूर्णिमा के स्नान पर्व के साथ ही इलाहाबाद में संगम तट पर लगे माघ मेले में कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं का संकल्प भी पूरा हो गया है। जो श्रद्धालु पिछले एक महीने से तम्बुओं के इस अनूठे शहर में रहकर अपना जीवन प्रभु के गुणगान और ईश्वर की आराधना में समर्पित किए हुए थे, कल्पवास का संकल्प पूरा होने पर अब वह अपने घरों की और लौटने लगे हैं।

कल्पवास के अन्तिम दिन श्रद्धालुओं ने विधि विधान से पूजा अर्चना की तुलसी -शालिग्राम का ब्याह रचाया, आदि अन्न जौ की आरती की और मंगल गीत गाये भगवान् श्री सत्य नारायण की कथा के वाचन से पूरा हो गया कल्पवास का संकल्प इस मौके पर कल्पवासियों में घर लौटने की खुशी थी तो गंगा माँ का सानिध्य छूटने का दुःख भी रहता है। धर्म ग्रंथो के मुताबिक पूरे माघ महीने संगम में डुबकी लगाकर पूजा-अर्चना करने वाले को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।लेकिन मान्यता है कि जो श्रद्धालु माघ महीने के 29 दिनों में संगम स्नान नही कर पाते अगर वो पूर्णिमा के दिन स्नान करते हैं तो उन्हें भी पूरे महीने का फल मिल जाता है।

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