मुंबई , फरवरी 28 -- महाराष्ट्र आतंकवाद रोधी दस्ता (एटीएस) के पूर्व प्रमुख के.पी. रधुवंशी ने आरोप लगाया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के शासनकाल के दौरान उन पर प्रमुख हिंदुत्व नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए राजनीतिक दबाव डाला गया, जबकि उनके अनुसार इसके लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं थे।

वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित की लिखी पुस्तक 'ट्रबलशूटर' के अनुसार श्री रघुवंशी ने कहा कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पदाधिकारी इंद्रेश कुमार जैसी वरिष्ठ हस्तियों को गिरफ्तार करने से इनकार करने के कारण उन्हें कीमत चुकानी पड़ी। इस पुस्तक का औपचारिक विमोचन मुंबई में अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग (रॉ) के पूर्व उप प्रमुख वी. बालाचंद्रन और पूर्व पुलिस महानिदेशक एएन रॉय द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम में मुंबई पुलिस के आयुक्त देवेन भारती, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व निदेशक सुबोध जायसवाल, पूर्व डीजीपी रश्मि शुक्ला, एटीएस प्रमुख नवल बजाज तथा कानून प्रवर्तन और खुफिया एजेंसियों के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

गौरतलब है कि भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 1980 बैच के अधिकारी रघुवंशी ने 35 वर्षों तक सेवा की और अपने करियर के दौरान कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने मुंबई दंगों पर श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के लिए गठित विशेष कार्य बल का नेतृत्व किया, महाराष्ट्र एटीएस की कमान संभाली और ठाणे पुलिस आयुक्त के रूप में भी कार्य किया। उन्हें गढ़चिरोली में सी-60 बल की स्थापना का श्रेय दिया जाता है, जो एक विशेष नक्सल रोधी कमांडो इकाई है।

वर्ष 2010 की घटनाओं का उल्लेख करते हुए पुस्तक में कहा गया है कि श्री रघुवंशी को अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही एटीएस प्रमुख के पद से हटा दिया गया था। इसमें आरोप लगाया गया है कि संप्रग सरकार में कांग्रेस के एक वरिष्ठ मंत्री ने 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में श्री कुमार को गिरफ्तार करने के लिए उन पर दबाव डाला था, लेकिन श्री रघुवंशी ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि श्री कुमार के खिलाफ कोई सबूत नहीं था।

पुस्तक के अनुसार इस इनकार के कारण मंत्रिस्तरीय तौर पर यह संदेह पैदा हुआ कि आरोपियों के साथ उनकी (श्री रघुवंशी) की मिलीभगत हैं। पुस्तक में उल्लेख है कि एटीएस में काम करने के दौरान श्री रघुवंशी ने लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित (जिन्हें बाद में इस मामले में आरोपी के रूप में नामित किया गया) को अधिकारियों के लिए एक कार्यशाला को आयोजित करने के लिए बुलाया गया था। उस समय पुरोहित सैन्य खुफिया से जुड़े थे और श्री रघुवंशी उन्हें खुफिया जानकारी एकत्र करने में कर्मियों को प्रशिक्षण देने के लिए उपयोगी मानते थे। श्री पुरोहित की गिरफ्तारी के बाद श्री रघुवंशी द्वारा उनका स्वागत करते हुए एक तस्वीर व्यापक रूप से प्रसारित हुई, जिससे मंत्री के मन में संदेह और गहरा हो गया।

श्री रघुवंशी ने दावा किया है कि उन्हें इस आरोप पर हटाया गया कि उन्होंने मीडिया को जानकारी लीक की थी, हालांकि उनका कहना है कि संबंधित सामग्री पहले से ही एक प्राथमिकी का हिस्सा थी और इसलिए सार्वजनिक डोमेन में थी। पुस्तक में 1993 के मुंबई दंगों के मामले में श्री ठाकरे की गिरफ्तारी नहीं होने की वजह से तत्कालीन महाराष्ट्र के गृह मंत्री छगन भुजबल के साथ तनाव का भी वर्णन है। इसमें श्री भुजबल के हवाले से कहा गया है कि उन्होंने 2000 में उनसे (श्री रघुवंशी) से पूछा था कि वह वह शिवसेना प्रमुख को गिरफ्तार करने से क्यों डर रहे थे।

गौरतलब है कि जहां श्रीकृष्ण आयोग ने श्री ठाकरे पर कथित रूप से हिंसा भड़काने का आरोप लगाया था और उनके निर्देशों की तुलना एक सैन्य जनरल से की थी। वहीं एसटीएफ के विधिक सलाहकार अधिवक्ता पी.आर. वकील ने अभियोजन के खिलाफ सिफारिश की थी। यह सलाह प्रमुख गवाहों की अनुपस्थिति पर आधारित थी, जिनमें कांग्रेस नेता चंद्रकांत हंडोरे और पत्रकार युवराज मोहिते शामिल थे, जो बयान दर्ज कराने के लिए एसटीएफ के समक्ष उपस्थित नहीं हुए थे।

इस पुस्तक से संकेत मिलता है कि श्री भुजबल का आग्रह पिछले राजनीतिक शत्रुतापूर्ण संबंधों से उपजा था। श्री भुजबल ने 1991 में श्री शरद पवार के नेतृत्व में कांग्रेस में शामिल होने के लिए शिव सेना छोड़ दी थी और 1997 में तनाव और बढ़ गया जब शिव सैनिकों ने उनके बंगले पर हमला किया और उन्हें बचने के लिए बाथरूम में शरण लेनी पड़ी थी।

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