कोलकाता , जनवरी 31 -- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ मुलाकात से ठीक दो दिन पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार को मतदाता सूची के चल रहे 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) में माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की तैनाती और उनकी भूमिका पर गंभीर आपत्ति जताते हुए उन्हें पत्र लिखा है।

श्री कुमार को लिखे एक पत्र में सुश्री बनर्जी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग (ईसीआई) ने कानूनी अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है और वैधानिक समर्थन के बिना एक समानांतर निर्णय लेने वाली संरचना तैयार कर दी है।

गौरतलब है कि सुश्री बनर्जी सोमवार को नयी दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के मुख्यालय में श्री कुमार से मिलने वाली हैं।

बैठक से 48 घंटे पहले मुख्यमंत्री ने अपना नया पत्र जारी कर चुनाव आयोग पर हमला और तेज कर दिया। इसमें पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के संचालन की तीखी आलोचना की गयी है। राज्य में एसआईआर शुरू होने के बाद से सुश्री बनर्जी का यह छठा पत्र है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने आयोग के तरीके पर लगातार विरोध जताया है।

सुश्री बनर्जी ने पत्र में चुनाव आयोग पर जन प्रतिनिधि अधिनियम और कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि मतदाता सूची संशोधन के दौरान अपनाये गये तरीके और नज़रिये ने 'कानून के निर्धारित सीमा को पार कर दिया है'। इससे 'आम लोगों में बहुत ज्यादा तकलीफ, डर और अनिश्चितता' है।

पत्र का एक मुख्य मुद्दा पश्चिम बंगाल में माइक्रो-ऑब्ज़र्वर की पहले कभी नहीं हुई नियुक्ति है। सुश्री बनर्जी ने बताया कि एसआईआर के दौरान लगभग 8,100 माइक्रो-ऑब्ज़र्वर तैनात किये गये हैं और इसे भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार बताया। उनके अनुसार, "ये माइक्रो-ऑब्ज़र्वर ठीक से प्रशिक्षित नहीं हैं। इतने संवेदनशील और कानूनी रूप से मुश्किल प्रक्रिया को संभालने के लिए किसी भी तरह से योग्य नहीं हैं। इसके बावजूद एकतरफ़ा तौर पर उन्हें क्षेत्र में भेज दिया गया है, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

सुश्री बनर्जी ने लिखा, "लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 या 1960 में माइक्रो-ऑब्जर्वर्स के लिए ऐसी किसी भूमिका या निर्णय लेने के अधिकार की परिकल्पना नहीं की गयी है।" उन्होंने कहा, "कानून के अनुसार, मतदाता सूची के रखरखाव, दावों और आपत्तियों पर सुनवाई करने, दस्तावेजों के सत्यापन और नामों को जोड़ने या हटाने पर अंतिम निर्णय लेने की शक्ति पूरी तरह से निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों के पास होती है।" उन्होंने तर्क दिया कि माइक्रो-ऑब्जर्वर्स का कोई भी सक्रिय हस्तक्षेप 'कानूनी रूप से मान्य नहीं' है।

मुख्यमंत्री ने एसआईआर प्रक्रिया को 'गंभीर मानवीय संकट' से भी जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि सुनवाई और दस्तावेजों के सत्यापन के दबाव के कारण जिलों में 'मानसिक पीड़ा' की स्थिति पैदा हो गयी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कवायद से जुड़े तनाव के कारण लगभग 140 लोगों की मृत्यु हो गयी है।

उन्होंने लिखा, "सभी मानवीय संवेदनाओं को दरकिनार करते हुए, इस कार्यक्रम को मौजूदा कानूनों और नियमों का उल्लंघन करके थोपा गया है।"सुश्री बनर्जी ने आगे यह भी सवाल उठाया कि तृणमूल कांग्रेस के सांसदों और विधायकों को एसआईआर के संबंध में क्यों बुलाया गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों ने चुनाव आयोग की जांच को सफलतापूर्वक पार करने के बाद ही चुनाव लड़ा और जीता था।

उन्होंने पत्र में कहा, "अब उनसे फिर से खुद को मतदाता के रूप में साबित करने के लिए क्यों कहा जाना चाहिए?" संविधान के अनुच्छेद 327 और 328 का हवाला देते हुए, सुश्री बनर्जी ने कहा कि चुनाव आयोग के पास कानून में संशोधन किये बिना या वैध नियम बनाये बिना एक समानांतर पर्यवेक्षक ढांचा बनाने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने भेदभाव का आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि जहाँ अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है, वहीं कहीं भी माइक्रो-ऑब्जर्वर के निर्णयों पर इस तरह के प्रभाव डालने का कोई पूर्व उदाहरण नहीं है।

उन्होंने आरोप लगाया, "पश्चिम बंगाल में केवल एक अलग और गैरकानूनी नियमों का सेट लागू किया जा रहा है।" सुश्री बनर्जी ने दावा किया कि कई केंद्रीय और राज्य पर्यवेक्षक पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से काम कर रहे हैं और कानूनी अधिकार के बिना ईसीआई पोर्टल पर नियंत्रण कर रहे हैं। इसे उन्होंने डाटा में हेरफेर करने और पात्र मतदाताओं को बाहर करने के लिए एक संभावित 'बैकडोर मैकेनिज्म' बताया।

पर्यवेक्षकों और माइक्रो-ऑब्जर्वरों दोनों की कानूनी स्थिति पर सवाल उठाते हुए सुश्री बनर्जी ने पूछा कि क्या उनके पास कोई भी वैधानिक शक्ति है, जो निर्णयों को मंजूरी देने या प्रभावित करने की हो या उनकी भूमिका केवल निरीक्षण और सहायता तक ही सीमित होनी चाहिए।

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