, April 6 -- वर्ष 1957 में सुचित्रा सेन की दो और हिन्दी फिल्मों मुसाफिर और चंपाकली में काम करने का अवसर मिला । ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ..मुसाफिर ..में उन्हें दूसरी बार दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला जबकि फिल्म चंपाकली में उन्होंने भारत भूषण के साथ काम किया लेकिन दोनों ही फिल्म टिकट खिड़की पर असफल साबित हुयी। वर्ष 1959 में प्रदर्शित बंगला फिल्म ..दीप जोले जाये ..में सुचित्रा सेन के अभिनय के नये आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इसमें सुचित्रा सेन ने राधा नामक नर्स का किरदार निभाया. जो पागल मरीजो का इलाज करते करते खुद ही बीमार हो जाती है।अपनी पीड़ा को सुचित्रा सेन ने आंखों और चेहरे से इस तरह पेश किया.जैसे वह अभिनय न करके वास्तविक जिंदगी जी रही हो। वर्ष 1969 में इस फिल्म का हिंदी में रीमेक ..खामोशी ..भी बनाया गया. जिसमें सुचित्रा सेन के किरदार को वहीदा रहमान ने रुपहले पर्दे पर साकार किया।

वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म ..बंबई का बाबू ..सुचित्रा सेन के सिने करियर की दूसरी सुपरहिट हिंदी फिल्म साबित हुयी।राज खोसला के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्हें देवानंद के साथ काम करने का अवसर मिला।इस जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया।वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म ..उत्तर फाल्गुनी ..सुचित्रा सेन की एक और महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुयी।असित सेन के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने मां और पुत्री के दोहरे किरदार को निभाया।इसमें उन्होंने एक वेश्या पन्ना बाई का किरदार निभाया जो अपनी वकील पुत्री सुपर्णा का साफ-सुथरे माहौल में पालन पोषण करने का संकल्प लिया है। इस फिल्म में पन्ना बाई की मृत्यु का दृश्य सिनेदर्शक आज भी नहीं भूल पाये हैं।

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