नयी दिल्ली , दिसंबर 29 -- ग्रामीण रोजगार की गारंटी वाला मनरेगा देश में गरीबी कम करने में कुछ खास प्रभावी नहीं रहा और उस पर किये गये व्यय का हिस्सा कुल मिलाकर सभी राज्यों में गरीब परिवारों के उपभोग व्यय का महज 10 प्रतिशत ही है। यह जानकारी देश के एक शीर्ष बैंक की अध्ययन रिपोर्ट में दी गयी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, नये स्वरूप में इस योजना में राज्यों को अपने हिस्से के वित्तीय भुगतान के लिए अपने संसाधनों को अच्छी तरह निर्देशित करना पड़ सकता है, लेकिन कुल मिलाकर वे पहले की तुलना में शुद्ध रूप से फायदे में रहेंगे। रिपोर्ट में चेक डैम आदि से भूजल स्तर में सुधार की दिशा में मनरेगा के कार्य की सराहना की गयी है।
मनरेगा की जगह लेने वाले संसद से पारित 'विकसित भारत जी राम जी' अधिनियम पर जारी राजनीतिक शोर के बीच स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के आर्थिक अनुसंधान प्रभाग एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है। रिपोर्ट में पारिवारिक उपभोग व्यय (एचसीई) 2023 के आंकड़ों के आधार पर सभी राज्यों में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों के उपभोग व्यय की तुलना में सभी राज्यों में मनरेगा पर व्यय को बहुत कम (करीब 10 प्रतिशत) बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "2023 में राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी पर मनरेगा का प्रभाव कुछ खास नहीं रहा, यद्यपि क्षेत्रीय स्तर पर कुछ अंतर अवश्य था।"महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह में सरकार ने इस माह समाप्त हुए संसद के बजट अधिवेशन में 'विकसित भारत गारंटी (रोजगार एवं आजीविका मिशन) ग्रामीण (वीबी - जी राम जी) अधिनियम को पारित कराया है। इसको लेकर विपक्ष विरोध कर रहा है।
इसमें जरूरतमंद ग्रामीण परिवारों को 100 की जगह 125 दिन के रोजगार की गारंटी दी गयी है ओर काम न मिलने पर उन्हें मुआवजा देने का प्रावधान है। पर इस योजना में अब केंद्र सरकार शत-प्रतिशत मजदूरी नहीं देगी, बल्कि 40 प्रतिशत बोझ राज्यों पर भी पड़ेगा। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। योजना के लिए राशि का प्रावधान उद्देश्यपरक होगा।
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है, "वर्षों से केंद्र की ओर से बजट में ज्यादा खर्च करने के बावजूद, नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे और इसलिए मनरेगा में नया प्राण फूंकना आवश्यक हो गया था ताकि इसे खासकर ग्राम पंचायतों की सक्रिय भागीदारी के जरिये एक जोशीली और जन भागीदारी वाली गति दी जा सके।"एसबीआई रिसर्च ने कहा है कि वर्ष 2026-27 में योजना के प्रस्तावित डिजाइन के तहत केंद्रीय सहायता बढ़कर लगभग 96,000 करोड़ रुपये हो जायेगी। यह केंद्र की लगातार और महत्वपूर्ण वित्तीय प्रतिबद्धता को दिखाता है। इसमें राज्यों का हिस्सा भी बढ़ेगा।
रिपोर्ट में इसी संदर्भ में कहा गया है कि केंद्र के कुल कर राजस्व का लगभग 55 प्रतिशत (वितरण और अनुदान सहित) राज्यों के साथ साझा किया जाता है।
एसबीआई का कहना है कि योजना के नये स्वरूप के लिए राज्यों को अपने खर्च को ज्यादा उत्पादक उद्देश्यों की तरफ मोड़ने की आवश्यकता हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, मनरेगा में परिवारों को साल में मिलने वाला रोजगार औसतन 45.9 दिन से बढ़कर 50.4 प्रतिशत तक पहुंचा था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि नये कानून के तहत राज्यों की सक्रिय भागीदारी और मजबूत दंड व्यवस्था के साथ यह होना चाहिये कि इस योजना में दिये गये काम और मांगे गये काम के बीच लगातार बने अंतर को खत्म किया जा सके। वित्त वर्ष 2019-20 में यह अंतर लगभग 14 प्रतिशत था। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह योजना अक्सर बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं के साथ मेल न खाने वाले कामों में फंसी रहती है।
मनरेगा के तहत 266 काम किये जा सकते हैं, जिनमें से 150 काम कृषि और उससे जुड़े हैं, 58 काम प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) से संबंधित हैं और 58 काम ग्रामीण अवसंरचना के हैं। वर्ष 2020-21 से 2025-26 (दिसंबर तक) के दौरान, औसतन कुल खर्च का 55 प्रतिशत कृषि और उससे जुड़े कामों पर किया गया है।
एसबीआई रिसर्च ने कहा है कि इस योजना के तहत चेक डैम, खेत पर तालाब, सामुदायिक तालाब, सिंचाई के लिए खुले कुएं आदि जैसे पानी से संबंधित विभिन्न काम किये जाते हैं।
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