बेंगलुरु , जनवरी 11 -- कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) ने रविवार को राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) नेतृत्व पर तीखा हमला करते हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) पर खुली बहस की मांग को "बौद्धिक दिवालियापन" करार दिया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश बाबू ने कहा कि केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष विजयेंद्र येदियुरप्पा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने संयुक्त प्रेस वार्ता कर खुली बहस की मांग की, जबकि कांग्रेस सरकार पहले ही कर्नाटक विधानसभा के विशेष सत्र के माध्यम से यह अवसर प्रदान कर चुकी है।उन्होंने आरोप लगाया कि जब विपक्ष ने मनरेगा का मुद्दा उठाया, तब केंद्र सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा में ही इस पर चर्चा से बचने का रवैया अपनाया।
श्री रमेश बाबू ने कहा कि कर्नाटक विधानसभा का विशेष सत्र केंद्र सरकार के मनरेगा योजना के प्रति "जनविरोधी दृष्टिकोण" को उजागर करने के लिए बुलाया जा रहा है।
उन्होंने कहा, "यदि एच.डी. कुमारस्वामी वास्तव में खुली बहस चाहते हैं, तो उन्हें राष्ट्रपति से आवश्यक अनुमति प्राप्त कर कर्नाटक विधानसभा में चर्चा में भाग लेना चाहिए।"केपीसीसी नेता ने श्री कुमारस्वामी से कर्नाटक के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने की भी अपील की और कहा कि उन्हें केंद्र सरकार से लंबित कई महत्वपूर्ण राज्य परियोजनाओं की मंजूरी सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्होंने केंद्र की मंजूरी की प्रतीक्षा में अटकी प्रमुख औद्योगिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का उल्लेख किया, जिनमें बेंगलुरु के लिए प्रस्तावित दूसरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, हुबली-बेलगावी-विजयपुरा हवाई अड्डों का विस्तार व उन्नयन, उत्तर और दक्षिण कर्नाटक में रक्षा औद्योगिक गलियारे, एयरोस्पेस एवं रक्षा औद्योगिक पार्क तथा बहु-जिला औद्योगिक पार्क शामिल हैं।
श्री रमेश बाबू ने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रॉनिक्स और विनिर्माण क्षेत्रों में बड़े निवेश प्रस्ताव, जिन्हें राज्य स्तर पर मंजूरी मिल चुकी है, वे भी पर्यावरण और तकनीकी स्वीकृतियों के अभाव में केंद्र सरकार के स्तर पर अटके हुए हैं। उन्होंने बताया कि बेंगलुरु उपनगरीय रेल परियोजना भी विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और एजेंसियों की मंजूरी का इंतजार कर रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि मेकेदातु, अपर कृष्णा चरण-तीन और कलासा-बंडूरी जैसी महत्वपूर्ण सिंचाई और पेयजल परियोजनाएं भी केंद्र की मंजूरी के अभाव में लंबित हैं।
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