चेन्नई , जनवरी 23 -- तमिलनाडु विधानसभा ने शुक्रवार को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम बदलने और इसके पुनर्गठन के तहत राज्यों पर 40 प्रतिशत वित्तीय बोझ डालने के केंद्र सरकार के कदम के खिलाफ एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। विधानसभा ने केंद्र से आग्रह किया कि यह योजना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से ही जारी रखी जाए, ताकि उनके द्वारा स्थापित सिद्धांतों को बरकरार रखा जाये।

यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री और द्रमुक अध्यक्ष एम.के. स्टालिन द्वारा पेश किया गया। विभिन्न दलों के नेताओं और सदस्यों द्वारा इस पर विचार रखे जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष एम. अप्पावु ने इसे ध्वनिमत से पारित घोषित किया।

मुख्यमंत्री स्टालिन ने प्रस्ताव पेश करते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा और कहा कि विभिन्न मंशाओं के तहत महात्मा गांधी का नाम योजना से हटाकर इसे 'विकसित भारत -गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)' (वीबी-जी राम जी) नाम दिया गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नई योजना में भी केंद्र और राज्यों की वित्तीय भागीदारी मनरेगा के समान ही होनी चाहिए।

प्रस्ताव में कहा गया कि यह सदन सर्वसम्मति से केंद्र सरकार से आग्रह करता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के काम के अधिकार को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के अनुसार सुनिश्चित किया जाए और गरीबों की रोजगार आवश्यकता तथा राज्यों के प्रदर्शन के आधार पर निरंतर वित्तपोषण किया जाए।

इसमें यह भी कहा गया कि योजना के लिए आवंटन पिछले वर्षों में मनरेगा के तहत किए गए आवंटन से कम नहीं होना चाहिए, ताकि महिलाओं, दिव्यांगजनों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की आजीविका सुरक्षित रहे और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

प्रस्ताव में केंद्र सरकार की उस प्रस्तावित नयी व्यवस्था का भी विरोध किया गया, जिसमें रोजगार की मांग के बजाय आकलन के आधार पर विवेकाधीन ढंग से धन आवंटित करने की बात कही गई है। सदन ने मांग की कि मनरेगा के तहत पहले से चली आ रही रोजगार मांग आधारित निधि आवंटन की प्रणाली को ही जारी रखा जाए।

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