नयी दिल्ली , फरवरी 03 -- उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मंदिर ट्रस्ट औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत 'उद्योग' की परिभाषा में नहीं आता है और एक मंदिर ट्रस्ट में काम करने वाले अकाउंटेंट को नौकरी से निकालने का फैसला सही है।
शीर्ष अदालत ने हालांकि कर्मचारियों की लंबी और बिना रुकावट वाली सेवा और नौकरी से निकालने से पहले औपचारिक जांच न होने को देखते हुए ट्रस्ट को एकमुश्त आर्थिक मुआवजा देने का निर्देश दिया।
न्यायाधीश अरविंद कुमार और न्यायाधीश प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने मंगलवार को कहा कि प्रतिवादी-ट्रस्ट एक मंदिर है और इस तरह यह 'उद्योग' शब्द के दायरे में नहीं आता।
न्यायालय ने श्रम अदालत और गुजरात उच्च न्यायालय के एक जैसे फैसलों में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें कर्मचारी की नौकरी पर वापस रखने की मांग को खारिज कर दिया गया था। अपीलकर्ता को 1977 में लक्ष्मीनारायण देव ट्रस्ट में अकाउंटेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था और उसने लगभग बारह साल तक लगातार सेवा दी थी।
आरोप है कि एक नवंबर, 1999 को बिना किसी घरेलू जांच के मौखिक रूप से उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। नौकरी पर वापस रखने की उसकी अर्जियों का कोई जवाब नहीं मिला, जिसके बाद उसने श्रमिक सुलह अधिकारी से संपर्क किया। सुलह की कार्यवाही के दौरान, ट्रस्ट ने उसका तबादला का पत्र थमा दिया और वड़ताल में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया। साथ ही चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर नौकरी से निकालने की कार्रवाई की जाएगी। यह विवाद आखिरकार एक श्रम संदर्भ में बदल गया। तीन दिसंबर, 2009 को श्रम अदालत ने संदर्भ को खारिज कर दिया और कहा कि ट्रस्ट, एक मंदिर और चैरिटेबल संस्था होने के नाते औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(जे) के तहत उद्योग के रूप में योग्य नहीं है, क्योंकि यह न तो विनिर्माण गतिविधि करता था और न ही लाभ कमाने वाली संस्था के रूप में काम करता था।
श्रम अदालत के फैसलों को गुजरात उच्च न्यायालय ने सही ठहराया, जिसने इंट्रा-कोर्ट अपील को खारिज कर दिया। इसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय में भेजा गया। विवादित फैसलों में दखल देने से इनकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रतिवादी मूल रूप से एक मंदिर ट्रस्ट था और उसे अधिनियम के तहत उद्योग की परिभाषा के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
अपीलकर्ता की 12 साल की बिना किसी रुकावट और बेदाग सर्विस और इस बात पर ध्यान देते हुए कि उसकी सेवा बिना किसी जांच के खत्म कर दी गई थी और उसके बाद उसे दूर जगह तबादला कर दिया गया था। न्यायालय ने माना कि निगरानी आर्थिक मुआवजा देने से न्याय होगा। पीठ ने कहा कि पूरे विवाद को ट्रस्ट को अपीलकर्ता को सभी दावों के पूरे और अंतिम निपटारे के तौर पर 12,00,000 रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश देकर सुलझाया जा सकता है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि यह रकम चार हफ़्ते के अंदर दी जाए, ऐसा न करने पर इस पर नौ प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज लगेगा। यह भी साफ किया गया कि यह रकम अपीलकर्ता श्रम अदालत में औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 33(सी)(2) के तहत निष्पादन याचिका या आवेदन दाखिल करके वसूल कर सकता है।
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