कोलकाता , फरवरी 11 -- केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उन आरोपों को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने केंद्र पर राज्य की लगभग दो लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि रोकने का दावा किया है। श्री यादव ने तीखा पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री पर अपने ही सरकारी कर्मचारियों को वर्षों से उनके वैध हक से वंचित रखने का आरोप लगाया।
कोलकाता में केंद्रीय बजट के महत्व को समझाते हुए एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए श्री यादव ने लंबित केंद्रीय धन पर मुख्यमंत्री के दावे का सीधे खंडन करने या राज्य सरकार की गणनाओं पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सुश्री बनर्जी देश की एकमात्र ऐसी मुख्यमंत्री हैं जो केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समान महंगाई भत्ता (डीए) देने से बचने के लिए अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय पहुंची हैं।
उन्होंने रेखांकित किया कि जहां पूरे देश में सातवें वेतन आयोग को लागू किया जा चुका है, वहीं पश्चिम बंगाल के लगभग 20 लाख सरकारी कर्मचारी अभी भी छठे वेतन आयोग से जुड़े महंगाई भत्ते के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
महंगाई भत्ते के मामले में उच्चतम न्यायालय हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए श्री यादव ने कहा कि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से माना है कि महंगाई भत्ता कर्मचारियों का एक वैध अधिकार है, जिसका उद्देश्य मुद्रास्फीति के प्रभाव को कम करना है।
उन्होंने कहा, "न्यायाधीशों ने अपने आदेश में लिखा है कि महंगाई भत्ता कोई दान नहीं बल्कि कर्मचारियों का उचित हक है। वह उच्चतम न्यायालय में मामला हार चुकी हैं और उन्हें राज्य सरकार के कर्मचारियों से माफी मांगनी चाहिए।"श्री यादव ने मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) को ममता बनर्जी की कानूनी चुनौती से तुलना करते हुए कहा कि जहां वह पुनरीक्षण के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय गईं, वहीं उन्होंने कर्मचारियों के हक के लिए लड़ने के बजाय उनके खिलाफ मुकदमा लड़ना चुना।
मुख्यमंत्री के उस दावे को खारिज करते हुए, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'एसआईआर' अभियान के दबाव के कारण राज्य कर्मचारियों की मृत्यु हुई, श्री यादव ने आरोप लगाया कि महंगाई भत्ता न मिलने से उपजी निराशा ही वास्तविक कारण थी।
उन्होंने दावा किया, "एसआईआर के कारण किसी की मृत्यु नहीं हुई। कई कर्मचारियों की मृत्यु उनके वैध महंगाई भत्ते को प्राप्त न कर पाने की हताशा के कारण हुई।"राज्य सरकार पर पुनरीक्षण प्रक्रिया को अपारदर्शी बनाने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए श्री यादव ने कहा कि सुश्री बनर्जी का प्रशासन "प्रशासनिक विफलता, राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता और पारदर्शिता की कमी" के लिए जाना जाता है। उन्होंने राज्य कर्मचारियों के खिलाफ महंगाई भत्ते के मुकदमे को प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण बताया।
राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय पर, केंद्रीय मंत्री ने भारत-बंगलादेश सीमा पर बाड़ लगाने के लिए भूमि अधिग्रहण के विवादों का उल्लेख किया और आरोप लगाया कि अदालती आदेशों के बावजूद राज्य सरकार भूमि सौंपने में देरी कर रही है।
उन्होंने कहा, "एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जिसने राज्य को एक निश्चित समय सीमा के भीतर भूमि उपलब्ध करने का निर्देश दिया। इसके बावजूद भूमि नहीं सौंपी गई है।"संवाददाता सम्मेलन में मौजूद पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के महंगाई भत्ते संबंधी आदेश पर यह कहकर सवालों से किनारा कर लिया कि मामला 'विचाराधीन' है।
उन्होंने कहा कि 5 फरवरी के फैसले में राज्य को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि वह कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को 2008 से 2019 के बीच की अवधि का बकाया महंगाई भत्ता चुकाए, जिसमें 31 मार्च तक बकाया राशि का 25 प्रतिशत हिस्सा शामिल है।
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