दरभंगा , मार्च 07 -- बिहार के प्रतिष्ठित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने शनिवार को कहा कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि विचारों और संस्कृति का संरक्षक भी है।
हिंदी साहित्य के महान कवि और लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की जयंती के अवसर पर विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आज आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर अज्ञेय ने अपने साहित्यिक कार्यों में भाषा और शिक्षा के महत्व को गहरे तरीके से समझा और प्रस्तुत किया है। उनका मानना था कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि विचारों और संस्कृति का संरक्षक भी है। उन्होंने कहा कि वे कई भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने अपने साहित्य में धर्म, संस्कृति, दर्शन एवं कलात्मक अवधारणाओं को विशेष रूप से महत्व दिया है। भारतीय समाज-दर्शन की गहरी छाप उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ती है। भारतीय समाज के मनः विश्लेषणात्मक स्वरूप को उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि मनोविश्लेषक फ्रायड का प्रभाव उनपर पूरी तरह से था।
प्रो. कुमार ने कहा कि अज्ञेय ने अपने लेखन में भाषा के माध्यम से समाज, मनुष्य और जीवन के जटिल पहलुओं को प्रकाशित किया। उनकी भाषा शिक्षा की अवधारणा में केवल व्याकरण और शब्दावली नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और अभिव्यक्ति के रूप में भाषा की शक्ति को स्थान दिया गया। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, विचारशील और समाज के प्रति जागरूक नागरिक तैयार करना है।
प्रो. विजय कुमार ने कहा कि अज्ञेय जी को वह कथाकार और कवि दोनों के रूप में महान साहित्यकार मानते हैं। उन्होंने कविता और भाषा के क्षेत्र में नवीनता और अर्थवत्ता लाने के लिए प्रयोगवाद और नई कविता आंदोलन का नेतृत्व किया और उनके संपादन में तार सप्तक सहित चार सप्तकों का प्रकाशन हुआ। प्रायः अज्ञेय जी को अस्तित्ववादी साहित्यकार माना जाता है। अज्ञेय जी हिन्दी कविता के अंतिम शिखर पुरुष हैं।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित