(जयंत राय चौधरी से)नयी दिल्ली , फरवरी 11 -- बंगलादेश में गुरुवार को होने वाला आम चुनाव न केवल इस देश की लोकतांत्रिक इच्छाशक्ति की परीक्षा हैं, बल्कि इस बात की भी परीक्षा हैं कि दक्षिण एशियाई पटल पर चीजें कैसे विकसित होंगी।
नागरिकों के पास मध्यमार्गी बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और इस्लामवादी जमात-ए-इस्लामी पार्टी के बीच चुनाव करने के साथ-साथ अपने देश के वैचारिक झुकाव, संस्थाओं की बेहतरी और गहरी होती समस्याओं के बीच शासन करने की क्षमता को चुनने का भी अवसर होगा।
भारत के लिए भी ऊंचे दांव लगे हुए हैं, क्योंकि उसकी अपनी राजनीति में बंगलादेश की स्थिति महत्वपूर्ण है। हालांकि भारत के पास उपलब्ध विकल्प भी सीमित है।
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के नाटकीय पतन के बाद से, बंगलादेश में लोग निरंतर सड़कों पर उतरते रहे हैं, नौकरशाही बदलती रही है और एक खास विचारधारा से शासन को चलाने की कोशिश होती रही है। हिंसा, मजदूरों की हड़ताल और धमकी अब केवल छिटपुट घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि राजनीति की पृष्ठभूमि बन गई हैं।
इस अस्थिरता के बीच भारतीय अधिकारियों ने निजी तौर पर एक कड़वा सच स्वीकार किया है कि निर्वाचित सरकार लंबे समय तक चलने वाली किसी अंतरिम सरकार से कहीं बेहतर है, खासकर ऐसी स्थिति में जब इस अंतरिम सरकार की सत्ता बिखरी हुई हो, विवादित हो और लगातार विरोधी ताकतों से जूझ रही हो।
बहरहाल यह जनादेश अपने सबसे बेहतरीन रूप में भी सही नहीं होगा, क्योंकि एक प्रमुख दल को चुनाव से बाहर रखा गया है। साथ ही चुनाव से पहले धमकियों और हिंसा का दौर भी देखने को मिल रहा है, जो निश्चित रूप से मतदान को प्रभावित करेगा।
सरकार द्वारा इस चुनाव के साथ-साथ जनमत संग्रह के लिए भी सहमति देने से परिणाम के इस्लामवादी पार्टियों की ओर झुकने के आसार हैं, क्योंकि ये दल खुद संवैधानिक विशेषज्ञों की आशंकाओं के बावजूद जनमत संग्रह का समर्थन कर रहे हैं।
हालांकि, बंगलादेश और भारत के लिए यह त्रुटिपूर्ण मतदान भी एक ऐसी अलोकतांत्रिक सरकार से अच्छा है, जो अराजकता और समस्याओं को बढ़ावा देती हो, क्योंकि इन अराजकताओं के सीमाओं के पार भी फैलने का खतरा होता है।
पश्चिमी थिंक टैंक सहित विश्लेषकों के अनुसार, अवामी लीग की अनुपस्थिति में बंगलादेश के लिए विकल्प तीन पर सिमट जाते हैं, बीएनपी के प्रभुत्व वाली सरकार, बीएनपी और जमात का मिश्रण, और जमात के प्रभुत्व वाला शासन।
जिया-उर-रहमान द्वारा स्थापित बीएनपी ने पुराने पाकिस्तान काल की मुस्लिम लीग के अवशेषों और अवामी लीग से अलग हुए लोगों को आकर्षित किया था। इसकी राजनीति भारत-विरोधी, अमेरिका-समर्थक रही है, लेकिन साथ ही व्यावहारिक और मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों का समर्थन करने वाली भी रही है।
'द न्यूयॉर्क एडिटोरियल' ने बंगलादेश में 'इनोविजन कंसल्टिंग' के दो जनमत सर्वेक्षणों का विश्लेषण किया है, जो बीएनपी को 52.8 प्रतिशत वोट शेयर के साथ बढ़त देते हैं और जमात के साथ लगभग 22 प्रतिशत का अंतर दिखाते हैं। वहीं 'नैरेटिव/आईआईएलडी' सर्वेक्षण इस अंतर को घटाकर केवल 1.1 प्रतिशत कर देता है।
हर कोई मानता है कि अंतर अवामी लीग के पूर्व मतदाताओं से पैदा होगा। वे किस ओर झुकेंगे? यदि अवामी लीग को मत देने वाले चार करोड़ मतदाताओं में से अधिकांश अपना समर्थन बीएनपी को देने का निर्णय लेते हैं, तो इसके नेता तारिक रहमान आसानी से शपथ ग्रहण तक पहुँच जाएंगे। यदि वह मंच जमात की ओर जाता है, तो खुशी उनके प्रतिद्वंद्वी शफीकुर रहमान के खेमे में होगी।
भारतीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस तथ्य के बावजूद कि बेगम खालिदा जिया के दो कार्यकाल के दौरान बीएनपी ने बंगलादेश ने कट्टरपंथी इस्लामवादी समूहों और पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाया था, भारत तारिक रहमान के साथ काम कर सकता है।
भले ही जमात के प्रतिनिधियों ने दिल्ली और ढाका दोनों जगह भारतीय राजनयिकों से मुलाकात कर खुद को भरोसेमंद साथी के रूप में पेश किया है और चुनाव पूर्व सामान्य भारत-विरोधी बयानबाजी पर चुप्पी साधे रखी है, लेकिन उनके साथ काम करने का पिछला अनुभव सुखद नहीं रहा है।
हालांकि, यह समझना होगा कि जमात ने 18 महीनों के अनियंत्रित शासन के दौरान राज्य के भीतर अपना प्रभाव मजबूत किया है। सुश्री हसीना की बेदखली के बाद इसकी शुरुआती कार्रवाइयों में से था निचले स्तर पर प्रशासकों का फेरबदल करना, विशेष रूप से शिक्षा क्षेत्र में व्यापक फेरबदल करना। ऐसे देश में जहाँ चुनाव अक्सर स्कूल और कॉलेज के शिक्षकों द्वारा संचालित किए जाते हैं, यह संस्थागत लाभ चुनावी लाभ में बदल सकता है।
जमात के कई नेताओं के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के साथ संबंध होना, चीन को लुभाने पर उनका जोर होना, चीन को सिलहट और अन्य हवाई अड्डों तक पहुंच देने की चर्चा ने भी भारतीय नीति निर्माताओं को खुश नहीं किया है। फिर भी यदि स्थिति ऐसी आती है, तो भारत जमात के साथ तब तक तालमेल बिठा लेगा जब तक वह अपनी मर्यादाओं का ध्यान रखता है।
1990 और 2000 के दशक की घटनाओं की यादें अब भी ताजा हैं। बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकारों ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों को भारत के पूर्वोत्तर में उग्रवाद भड़काने में मदद की थी, जबकि जमात और संबद्ध इस्लामवादी समुहों ने भारत के भीतर हमलों के लिए जिम्मेदार उग्रवादी समूहों के प्रशिक्षण और वित्त पोषण की सुविधा प्रदान की थी।
चिंताजनक यह भी है कि सुश्री हसीना के कार्यकाल में गिरफ्तार किए गए उग्रवादियों को 2024 की उथल-पुथल के बाद रिहा कर दिया गया था। भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि उनमें से कई चुपचाप लेकिन अभियान के लिए संगठित हो गये हैं।
भारत की रणनीतिक प्रवृत्ति वैचारिक के बजाय लंबे समय से व्यावहारिक रही है। इसने ढाका में हर तरह की सरकारों के साथ काम किया है, यह पहचानते हुए कि कुटनीति के लिहाज से सत्ता में रहने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ जुड़ाव आवश्यक है। फिर भी व्यवहारिकता की सीमाएँ होती हैं और पिछले 18 महीनों में जो धैर्य दिखाया गया है, उसकी परीक्षा हो सकती है।
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