जालंधर , अप्रैल 13 -- भारतीय न्यूरोलॉजी अकादमी के कार्यकारी सदस्य डॉ नरेश पुरोहित के अनुसार, भारत में एक 'न्यूरोलॉजिकल समस्या' दस्तक दे रही है।
उन्होंने कहा कि अनुमानों के अनुसार 2050 तक पार्किंसन रोग के मामलों में 168 प्रतिशत की भारी वृद्धि हो सकती है। यह प्रचलित मिथक कि पार्किंसन मुख्य रूप से केवल वृद्धों को प्रभावित करता है, बदलते महामारी विज्ञान के रुझानों और नैदानिक टिप्पणियों के आलोक में तेजी से समाप्त हो रहा है।
हाल ही में 'अर्ली-ऑनसेट' (कम उम्र में शुरुआत) पार्किंसन के मामलों में वृद्धि, विशेष रूप से भारत जैसेदेशों में जहां रोगियों का एक बड़ा हिस्सा 50 वर्ष की आयु से पहले ही इसके लक्षणों का अनुभव कर रहा है,इस गलत धारणा को चुनौती देती है।
पचास वर्ष से कम उम्र के लोगों में इस न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी की बढ़ती शुरुआत पर चिंता जताते हुए, एसोसिएशन ऑफ स्टडीज फॉर मेंटल केयर के मुख्य अन्वेषक डॉ. पुरोहित ने 'यूनीवार्ता' को बताया कि भारत पार्किंसन रोगियों के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि लगभग 40-45 प्रतिशत भारतीय रोगी 22 से 49 वर्ष की आयु के बीच इसके लक्षणों का अनुभव करते हैं, जिन्हें 'अर्ली ऑनसेट पार्किंसन' कीश्रेणी में रखा गया है। उम्र अभी भी हालांकि एक बड़ा जोखिम कारक है, लेकिन उभरते प्रमाण बताते हैं कि पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थ, आनुवंशिक प्रवृत्तियां और जीवनशैली से जुड़े कारक कम उम्र में पार्किंसन कोट्रिगर कर रहे हैं।
जर्नल 'पार्किंसनिज़्म एंड रिलेटेड डिसऑर्डर' में प्रकाशित 2024 के एक अध्ययन का हवाला देते हुए प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. पुरोहित ने कहा कि भारत में पार्किंसन की व्यापकता बढ़ रही है, और अन्य देशों की तुलना में यहाँ बीमारी शुरू होने की औसत आयु लगभग एक दशक कम है।
डॉ. पुरोहित ने कहा, " कीटनाशकों के संपर्क में आना, वायु प्रदूषण और खान-पान की आदतें आनुवंशिक संवेदनशीलता के साथ मिलकर बीमारी के स्वरूप को तय करती हैं। यह उस धारणा को चुनौती देता है कि पार्किंसंस केवल बुजुर्गों की बीमारी है। "उन्होंने बताया कि गतिविधियों की गति में कमी, शरीर में जकड़न, कंपन और असंतुलित मुद्रा जैसे लक्षणों के कारण पार्किंसन दैनिक गतिविधियों और गतिशीलता को काफी बाधित कर सकता है, जिससे रोगी को भारी मानसिक और शारीरिक कष्ट होता है। उन्होंने बताया कि पार्किंसन के मरीज न केवल कंपन, धीमापन और जकड़न जैसे लक्षणों से जूझते हैं, बल्कि वे अक्सर नींद में खलल, चिंता, अवसाद और तकलीफों जैसे अनदेखे गैर-मोटर लक्षणों का भी सामना करते हैं। उन्होंने अंत में जोर देते हुए कहा, " चूंकि पार्किंसन रोगियों का एक बड़ा हिस्सा युवा वर्ग का है, इसलिए यह पहचानना अनिवार्य है कि यह विकार केवल उम्र के आधार पर भेदभाव नहीं करता है। इसके बजाय, आनुवंशिक प्रवृत्तियों, पर्यावरणीय कारकों और अन्य बीमारियों का जटिल मेल इसके कारणों को और पेचीदा बना देता है। "पार्किंसन रोग का शीघ्र पता लगाना और प्रभावी प्रबंधन, लक्षणों को नियंत्रित करने, बीमारी की प्रगति को धीमा करने और जटिलताओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे रोगी के जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार होता है।
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