नई दिल्ली , दिसंबर 17 -- जानी-मानी अर्थशास्त्री और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की पूर्व अधिकारी गीता गोपीनाथ ने बुधवार को कहा कि भारत और अमेरिका को आपस में आयात शुल्क के मुद्दे के समाधान के लिए रचानात्मक चर्चा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि चर्चा करते रहने से समय के साथ शुल्क नीचे आ सकते हैं।

सुश्री गोपीनाथ ने यहां इडिया इकोनॉमिक कान्क्लेव के एक सत्र में भारत की व्यापार रणनीति को लेकर कहा, "दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी संबंधों की गहराई को देखते हुए आने वाले वर्षों में अमेरिका के साथ बातचीत महत्वपूर्ण होगी।'उन्होंने कहा , "शुल्क के मुद्दे को बातचीत और सहयोग से सुलझाया जाना चाहिए।" उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने भारत पर अगस्त से 50 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा रखा है और इस तरह इस देश की गिनती अमेरिका में सबसे ऊंचे शुल्क का सामना कर रहे देशों में हो गयी है। दोनों देश एक व्यापार समझौते की बातचीत भी कर रहे हैं।

अंतराष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रथम उप-प्रबंध निदेशिका रह चुकीं सुश्री गोपीनाथ ने कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत करते रहने से शुल्क का स्तर समय के साथ कम हो सकता है, जिससे अमेरिका के साथ निर्यात, निवेश प्रवाह और आपूर्ति शृंखला के समन्वय को बढ़ावा मिलेगा।

उन्होंने कहा कि इस समय समय विश्व अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर में प्रवेश कर गई है जहां व्यापार नीति अब पूरी तरह से अर्थशास्त्र से नहीं, बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी विचारों से तय हो रही हैं।

इस समय अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अध्यापन का काम कर हीं सुश्री गोपीनाथ ने भारत के लिए किसी एक बाज़ार से परे अपने व्यापार संबंधों को व्यापक बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और कहा, "ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ मजबूत आर्थिक साझेदारी बनाने से भारत को वैश्विक व्यापार विखंडन से होने वाले जोखिमों को कम करने और विकास के वैकल्पिक रास्ते बनाने में मदद मिलेगी।"सुश्री गोपीनाथ समझाया, "कई देशों में शूल्क की दरें स्पष्ट रूप से बढ़ी हैं, लेकिन वास्तविक प्रभाव को अक्सर गलत समझा जाता है। इसकी दरें वास्तव में कंपनियों की ओर से भुगतान की जाने वाली प्रभावी दरों की तुलना में अधिक नाटकीय लगती हैं।" उन्होंने वैश्विक व्यापार डेटा की अधिक सूक्ष्मता से जांच करने का सुझाव दिया।

उन्होंने बताया कि हालिया शुल्क बढ़ोतरी के खिलाफ जवाबी कार्रवाई न करने के यूरोप के फैसले ने व्यापार तनाव को अनियंत्रित रूप से बढ़ने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी राय में प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब तेज टकराव के बजाय स्थिरता की तलाश कर रही हैं।

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