लक्षद्वीप/कोच्चि , दिसंबर 14 -- भारत के समुद्री संसाधनों के विकास (नीली अर्थव्यवस्था) को मजबूत करने और समुद्री खाद्य निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में एक प्रमुख नीतिगत पहल करते हुए, भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) से प्राप्त मत्स्य संसाधनों को अब से "भारतीय मूल" के रूप में मान्यता दी जाएगी।

इस कदम से भारतीय मछुआरों को सशक्त बनाने, मछली पकड़ने के कार्यों के लिए कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करने और टूना मछली जैसी महंगी प्रजातियों की अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाने की उम्मीद है।

केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह ने लक्षद्वीप के बंगाराम द्वीप पर शनिवार को मत्स्य पालन विभाग द्वारा लक्षद्वीप केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के सहयोग से आयोजित "लक्षद्वीप द्वीप समूह के मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्र में निवेश के अवसर" पर पहले निवेशक सम्मेलन में यह घोषणा की। इस सम्मेलन में देश भर के निवेशकों ने भाग लिया, जिसके दौरान लगभग 519 करोड़ के निवेश प्रस्तावों की परिकल्पना की गई।

श्री सिंह ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि भारत सरकार ने ईईजेड में मछली पकड़ने के नियम बनाए हैं और ये भारतीय मछुआरों को अधिकृत "एक्सेस पास" के जरिए कानूनी रूप से काम करने में सहायता देते हैं। उन्होंने कहा कि यह भारतीय जहाजों को अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों का पालन करते हुए महंगी टूना मछली और अन्य मछली उत्पादों को वैश्विक बाजारों में निर्यात करने के मौके बढ़ायेगा।

उन्होंने आगे कहा कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत, भारत के ईईजेड से पकड़ी गई मछली को अब भारतीय मूल का माना जाएगा, जिससे निर्यात को एक बड़ा बढ़ावा मिलेगा। गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के दिशानिर्देशों के जारी होने से भारतीय ध्वज वाले जहाजों को अपतटीय जल में कानूनी रूप से संचालन का अधिकार मिल गया है। इससे गहरे समुद्र में मछली पकड़ने और मूल्यवर्धित समुद्री खाद्य प्रसंस्करण में निवेश के व्यापक अवसर खुलेंगे।

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