नयी दिल्ली , जनवरी 30 -- सत्ताईस देशों के समूह यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते से जहां भारत वैश्विक वित्तीय संरचना में रणनीतिक तौर पर "तीसरे ध्रुव" के रूप में उभरता है वहीं सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी से उसे उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का सदस्य बने बिना ही संगठन के महत्वपूर्ण सहयोगी का दर्जा मिल जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में "तीसरा ध्रुव" शब्द का प्रयोग एक उभरती वैश्विक शक्ति, विशेष रूप से भारत ,के लिए किया जाता है, जो बहुध्रुवीय विश्व में संतुलन की भूमिका में है यानी भारत, अमेरिका-चीन (जी-2) द्विध्रुवीय ढांचे पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय स्वतंत्र रूप से तीसरे ध्रुव के रूप में उभर रहा है।
दोनों पक्षों ने 27 जनवरी को महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौते के संपन्न होने की घोषणा करने के साथ-साथ सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर किए। यह भारत और यूरोपीय संघ के बीच अपनी तरह का पहला व्यापक ढांचा है।
यूरोपीय आयोग ने एक वक्तव्य जारी कर कहा है कि इस साझेदारी के अंतर्गत भारत और यूरोपीय संघ रक्षा औद्योगिक सहयोग को सुदृढ़ करेंगे और रक्षा पहलों पर समन्वय को आगे बढ़ाएँगे।
सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी समुद्री सुरक्षा, अप्रसार और निरस्त्रीकरण, अंतरिक्ष, साइबर एवं हाइब्रिड खतरों से निपटने तथा आतंकवाद-रोधी प्रयासों जैसे साझा प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में घनिष्ठ सहयोग और संयुक्त पहलों को सक्षम बनाती है।
दोनों पक्षों ने गोपनीय सूचना के आदान-प्रदान को सक्षम बनाने के लिए "सूचना सुरक्षा समझौते" से संबंधित वार्ता भी शुरू की है, जो यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों के सुरक्षा हितों के अनुरूप होगा। इससे " यूरोपीय संघ संधि-आधारित ढाँचों के अनुरूप यूरोपीय संघ की सुरक्षा और रक्षा पहलों में भारत की भागीदारी" का मार्ग प्रशस्त होगा।
यूरोपीय आयोग की यह टिप्पणी- " यूरोपीय संघ संधि-आधारित ढाँचों के अनुरूप भारत की यूरोपीय संघ सुरक्षा एवं रक्षा पहलों में भागीदारी का मार्ग प्रशस्त होना"-नाटो में भारत की व्यापक भूमिका की ओर संकेत करती है और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव को दर्शाती है।
यूरोपीय आयोग की उच्च प्रतिनिधि एवं उपाध्यक्ष काजा कालास ने भी कहा है, " यूराेपीय संघ और भारत के बीच लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी रही है। नई सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर के साथ हम यूरोपीय संघ-भारत संबंधों के एक नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं। इससे समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी और साइबर-रक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार होगा। यूरोपीय संघ और भारत विश्व में हो रहे परिवर्तनों को समान दृष्टि से देखते हैं और मिलकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। सुरक्षा अब हमारे संबंधों का एक मुख्य स्तंभ बन गई है।"रणनीतिक स्वायत्तता पर भारत के पारंपरिक रुख और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में उसके अग्रणी योगदान के कारण नाटो भी भारत को महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है।
इन घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि नाटो रूस जैसे देशों के साथ संवाद बनाए रखने की भारत की क्षमता को ध्यान में रखते हुए अफगानिस्तान और हिंद-प्रशांत जैसे जटिल क्षेत्रीय संकटों के प्रबंधन में भारत की भूमिका को महत्व दे रहा है, विशेष रूप सेभारत सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) और महासागर सिद्धांतों के माध्यम से पश्चिमी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश के रूप में उभर रहा है।
नाटो के बदलते 'फोकस' और अमेरिकी गतिविधियों की भी इसमें भूमिका है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की आक्रामक नीतियों और कुछ नाटो सदस्यों पर लगाए गए अत्यधिक टैरिफ के कारण नाटो देश दबाव में हैं। अमेरिका के इन कदमों ने सहयोगियों को वैकल्पिक सुरक्षा ढाँचों की तलाश के लिए प्रेरित किया है। भारत-यूरोपीय संघ रक्षा साझेदारी अमेरिका पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक कदम है, हालांकि नाटो महासचिव मार्क रुटे ने कहा है कि यूरोप अमेरिकी सुरक्षा छत्र के बिना स्वयं की पूर्ण रक्षा नहीं कर सकता।
यह भी संभावना है कि भारत 'नाटो प्लस' में शामिल हो सकता है। नाटो की सदस्यता के बजाय भारत-यूरोपीय संघ संबंध एक ऐसे राजनीतिक संवाद की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे नाटो को भारत के भू-रणनीतिक दृष्टिकोण का लाभ मिल सके। यह साझेदारी भारत को नाटो या 'नाटो प्लस' का सदस्य बनाए बिना नाटो के और निकट लाती है।
नाटो प्लस या ( नाटो-5) नाटो और पांच सहयोगी देशों-ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, जापान, इज़राइल और दक्षिण कोरिया-के बीच एक अनौपचारिक सुरक्षा व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य वैश्विक रक्षा सहयोग और खुफिया साझेदारी को बढ़ाना है। अमेरिका ने हिंद-प्रशांत संबंधों को मजबूत करने के लिए भारत को इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है किंतु भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता के प्रतिकूल होने के कारण इसे अस्वीकार कर दिया है। 'नाटो प्लस' में भारत की भागीदारी रूस के साथ उसके घनिष्ठ संबंधों को प्रभावित कर सकती है।
भारत संधि-बद्ध गठबंधनों की बजाय "सीमित-दायित्व साझेदारियों" को प्राथमिकता देता है। अभी उसका उद्देश्य सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता के बिना आतंकवाद और समुद्री असुरक्षा जैसे साझा खतरों से निपटने के लिए नाटो के साथ निकटता का फायदा उठाना है।
भारत के लिए नाटो प्लस में शामिल होने के कुछ लाभ भी हैं। इससे भारत को इन देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने की सुविधा, नवीनतम सैन्य प्रौद्योगिकी तक शीघ्र पहुँच और अमेरिका के साथ रक्षा साझेदारी को और मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी भारत को वही लाभ देती है, जिनकी अपेक्षा नाटो प्लस सदस्यता से की जा सकती थी। यह समझौता मौजूदा परामर्शों को उन्नत कर वार्षिक मंत्री-स्तरीय संवाद में परिवर्तित करता है, जो नीतिगत दिशा और प्रगति की निगरानी करेगा।
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