नयी दिल्ली , जनवरी 30 -- देश के वैज्ञानिकों ने फोटो कैपेसिस्टर नाम से एक ऐसा ऐसा सुपरकैपेसिस्टर विकसित किया है जो सूरज की रोशनी से स्वत: ऊर्जा लेकर उसे संग्रहित भी कर सकता है।

माना जा रहा है कि यह स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम हो सकता है, जो पोर्टेबल और ऑफ ग्रिड प्रौद्योगिकी के लिए उपयोगी, कम लागत और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा का मार्ग प्रशस्त करेगा।

परंपरागत रूप से, सौर ऊर्जा प्रणालियां दो अलग-अलग इकाइयों पर निर्भर करती हैं जिनमें ऊर्जा संग्रहण के लिए सौर पैनल और ऊर्जा भंडारण के लिए बैटरी या सुपरकैपेसिटर की जरूरत होगी। ऊर्जा संग्रहण इकाई और भंडारण इकाई के बीच वोल्टेज और करंट के असंतुलन को नियंत्रित करने के लिए इनमें अतिरिक्त विद्युत प्रबंधन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आवश्यकता होती है और इसको पूरा करने से प्रणाली की जटिलता, लागत, ऊर्जा हानि और उपकरण का आकार बढ़ जाता है, जो विशेष रूप से लघु और स्वायत्त उपकरणों के लिए हानिकारक साबित होता है।

सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अधीन एक स्वायत्त संस्थान, सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस), बेंगलुरु द्वारा विकसित इस नए फोटो-रिचार्जेबल सुपरकैपेसिटर ने सूर्य के प्रकाश को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने और उस ऊर्जा को बाद में उपयोग के लिए संग्रहित करने की दोनों प्रक्रियाओं को सहजता से संयोजित किया है। इससे डिजाइन सरल हो जाता है और रूपांतरण तथा भंडारण के दौरान ऊर्जा हानि कम से कम हो जाती है।

डॉ. कविता पांडे के मार्गदर्शन में, बाइंडर-मुक्त निकल-कोबाल्ट ऑक्साइड नैनोवायरों के उपयोग की मदद से नवाचार हुआ है जो इन्हें एक सरल इन सीटू हाइड्रोथर्मल प्रक्रिया का उपयोग करके निकल फोम पर समान रूप से तैयार किया गया है। केवल कुछ नैनोमीटर लंबाई और कई माइक्रोमीटर व्यास वाले ये नैनोवायर अत्यंत छिद्रपूर्ण और सुचालक 3डी नेटवर्क बनाते हैं जो सूर्य के प्रकाश को कुशलतापूर्वक अवशोषित करता है और विद्युत आवेश को संग्रहित करता है। इस अनूठी संरचना के कारण यह पदार्थ एक साथ सौर ऊर्जा संग्राहक और सुपरकैपेसिटर इलेक्ट्रोड के रूप में कार्य कर सकता है।

सूर्य के प्रकाश को इकट्ठा करने और ऊर्जा भंडारण को एक ही उपकरण में एकीकृत करके, भारतीय वैज्ञानिकों ने स्व-चार्जिंग पावर सिस्टम विकसित किए हैं। जहां बिजली ग्रिड नहीं है उन दूरदराज के क्षेत्रों में भी काम कर सकते हैं है। ऐसी तकनीक गैर नवीकरणीय ईंधन और पारंपरिक बैटरियों पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकती है। माना जा रहा है कि इससे एक टिकाऊ और हरित ऊर्जा भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा।

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