नयी दिल्ली , मई 01 -- राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया हाटकर ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय महिलाएं न केवल आर्थिक और सामाजिक विकास की महत्वपूर्ण वाहक हैं, बल्कि वे देश के सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक भी हैं।
विद्या भारती उच्चशिक्षा संस्थान के दिल्ली प्रांत की ओर से आज यहां स्थित भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (आईएनएसए ) के सभागार में आयोजित सप्त शक्ति नारी सम्मेलन में बोलते हुए श्रीमती राहाटकर ने कहा कि विकसित भारत-2047 का लक्ष्य महिलाओं के सशक्तिकरण और नेतृत्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसके बिना यह संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक विकास की महत्वपूर्ण वाहक तथा देश के सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक बताया। साथ ही उन्होंने बढ़ते व्यक्तिवाद और परिवारवाद से संस्था के कमजोर होने और मूल्य-क्षरण जैसी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने "तेरे मेरे सपने" जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख किया, जो विवाह पूर्व संवाद को बढ़ावा देने और पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।
इस सम्मेलन में देशभर से प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं, सामाजिक चिंतकों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। "सशक्त महिलाएं, विकसित भारत के लिए" विषय पर केंद्रित इस सम्मेलन ने एक विकसित, समावेशी एवं सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ भारत के निर्माण में महिलाओं की परिवर्तनकारी भूमिका को रेखांकित किया। यह सम्मेलन सप्तशक्ति (सप्तशक्ति) की अवधारणा पर आधारित था, जो स्त्रीत्व के सात मूल गुणों-श्री (समृद्धि), वाक् (वाणी), कीर्ति (यश), स्मृति (स्मरण शक्ति), मेधा (बुद्धि), क्षमा (क्षमाशीलता) और धृति (धैर्य)-को अभिव्यक्त करता है। इन गुणों को महिलाओं की अंतर्निहित शक्ति तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी सतत सभ्यतागत भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन सम्मेलन की संयोजक प्रो. कुशा तिवारी के स्वागत भाषण से हुआ, जिसमें उन्होंने सम्मेलन की वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया। श्रीमती राहाटकर इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुईं। इस मौके पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल हुई इंदिरा गांधी राष्ट्रीय ओपन विश्वविद्यालय (आईजीएनओयू) की कुलपति प्रो. उमा कांजिलाल ने उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने सशक्तिकरण के विभिन्न आयामों-शिक्षा शक्ति, आर्थिक शक्ति, डिजिटल शक्ति, स्वास्थ्य शक्ति, नेतृत्व शक्ति और सांस्कृतिक शक्ति को समग्र विकास के स्तंभ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि जहां महिलाएं देश की लगभग 48 प्रतिशत जनसंख्या का हिस्सा हैं, वहीं केवल 34 प्रतिशत महिलाएं ही कार्यबल में शामिल हैं। इस अंतर को शिक्षा, नेतृत्व और उद्यमिता के माध्यम से दूर करना आवश्यक है।
विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल हुईं प्रो. मंजूश्री सरदेशपांडे ने भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति की निरंतरता को रेखांकित किया। उन्होंने सप्तशक्ति के साथ-साथ पंचकोश की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के समन्वय को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भारतीय नारी सदैव शक्ति, ज्ञान और करुणा की प्रतीक रही है और आज भी समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
मुख्य वक्ता के तौर पर समारोह में शामिल हुईं दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने महिला सशक्तिकरण के बहुआयामी स्वरूप पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सशक्तिकरण केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आत्मविश्वास, नेतृत्व और सामाजिक चेतना भी शामिल है। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं से प्रेरणा लेने पर बल देते हुए जीजाबाई , अहिल्याबाई होलकर, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले तथा गौरा देवी जैसी महान विभूतियों का उल्लेख किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. कैलाशचंद्र शर्मा ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना राष्ट्र निर्माण अधूरा है। उन्होंने सप्त शक्ति-ज्ञान, शक्ति, सेवा, मूल्य, नेतृत्व, नवाचार और समर्पण-को विकसित भारत के निर्माण का मार्गदर्शक सिद्धांत बताया।
उद्घाटन सत्र के पश्चात सम्मेलन में दो पूर्ण सत्र आयोजित किए गए, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्यमिता, नेतृत्व और सांस्कृतिक पहचान जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। विभिन्न विद्वानों और विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए, जिससे विमर्श को सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से समृद्धि मिली। समापन सत्र में नयी दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि महिलाओं के नेतृत्व में विकास के लिए इस प्रकार के मंच अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने विधायी संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि नीतिगत एवं संस्थागत ढांचे को सुदृढ़ करना समय की आवश्यकता है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित