बेंगलुरु , जनवरी 13 -- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार को राज्य सरकार को महत्वाकांक्षी बैंगलोर-मैसूर एक्सप्रेसवे और बुनियादी ढांचा कॉरिडोर परियोजना के कार्यान्वयन पर फिर से विचार करने का निर्देश देते हुए नोट किया कि बेंगलुरु में भीड़ कम करने के लिए तीन दशक पहले शुरू की गयी यह परियोजना "सिर्फ कागजों पर ही रह गयी है।"न्यायमूर्ति डीके सिंह और न्यायमूर्ति टी वेंकटेश नाइक की पीठ ने यह टिप्पणी चंद्रिका नाम की एक ज़मीन मालिक की ओर से दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए की, जो परियोजना के लिये अधिग्रहित ज़मीन के लिये अतिरिक्त मुआवज़े की मांग कर रही थी। पीठ ने कहा कि अगस्त 1995 में परियोजना तकनीकी रिपोर्ट (पीटीआर) तैयार होने के लगभग 30 साल बीत जाने के बाद भी परियोजना के मुख्य उद्देश्य हासिल नहीं हुए हैं।
बैंगलोर-मैसूर बुनियादी ढांचा कॉरिडोर क्षेत्र नियोजन प्राधिकरण और अन्य बनाम नंदी बुनियादी ढांचा कॉरिडोर एंटरप्राइज लिमिटेड और अन्य (2021) मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने ज़मीनी हकीकत पर चिंता व्यक्त की। पीठ ने बताया कि प्रस्तावित 111 किलोमीटर लंबे बैंगलोर-मैसूर एक्सप्रेसवे का केवल लगभग एक किलोमीटर ही बनाया गया है, जबकि परियोजना के विकासक ने लगभग 47 किलोमीटर पेरिफेरल सड़कें बनाई हैं जिनसे टोल वसूला जा रहा है।
न्यायालय ने कहा कि परियोजना में न सिर्फ एक एक्सप्रेसवे बल्कि आवासीय, औद्योगिक और वाणिज्यिक सुविधाओं के साथ-साथ उपयोगिताओं और सुविधाओं वाले पांच आत्मनिर्भर टाउनशिप की भी परिकल्पना की गयी थी।
पीठ ने कहा कि 35 से अधिक वर्षों के बाद भी एक भी टाउनशिप विकसित नहीं हुई है और बेंगलुरु में भीड़ कम करने तथा सैटेलाइट टाउनशिप बनाने का मूल उद्देश्य अधूरा रह गया है।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि शहर की तेज़ी से बढ़ती आबादी का अनुमान लगभग 1.4 करोड़ है तथा यातायात जाम, खराब बुनियादी ढांचा और पर्यावरण प्रदूषण आम बात हो गयी है। पीटीआर के पीछे की सुंदर और भविष्यवादी अवधारणा राजनीतिक और नौकरशाही हस्तक्षेप, कथित भ्रष्टाचार, और अधिकारियों तथा परियोजना डेवलपर की विफलताओं के कारण अटकी हुई है।
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