नयी दिल्ली , फरवरी 09 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि जनता के पैसे के ट्रस्टी के तौर पर बैंकों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे ग्राहकों को साइबर धोखाधड़ी से, खासकर तथाकथित "डिजिटल अरेस्ट" घोटाले से होने वाले धोखाधड़ी से पहले से ही सुरक्षित रखें।

मुख्य न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ डिजिटल अरेस्ट घोटाले के बढ़ते खतरे से जुड़े एक स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी।

पीठ ने कहा कि बैंकों को ऐसे सिस्टम बनाने चाहिए जिनसे ग्राहकों को असामान्य या बड़े पैमाने पर लेन देन होने पर अलर्ट किया जा सके, खासकर तब जब ऐसे लेन देन ग्राहक के सामान्य बैंकिंग व्यवहार से अलग हों।

अदालत ने कहा कि जब कोई पेंशनर या रिटायर्ड व्यक्ति जो आमतौर पर 10,000 या 20,000 रुपये निकालता है, अचानक 25 लाख या 50 लाख रुपये का लेन देन करता है, तो बैंकों को तुरंत अलर्ट जारी करना चाहिए और ऐसे लेन देन को संदिग्ध के तौर पर चिहिन्त चाहिए।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने साइबर धाेखाधड़ी-से निपटने के लिए बैंकों के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) का ड्राफ़्ट तैयार किया है। इसमें दूसरी बातों के अलावा, धोखाधड़ी वाली निकासी को रोकने के लिए खाते पर अस्थायी डेबिट रोक लगाने का भी प्रावधान है।

गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अप्रैल 2021 और नवंबर 2025 के बीच साइबर धोखाधड़ी के ज़रिए 52,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की हेराफेरी की गई थी। उन्होंने बताया कि इसमें शामिल रकम कई राज्यों के सालाना बजट से ज़्यादा थी। उन्होंने आगे सुझाव दिया कि आरबीआई को बेहतर रिपोर्टिंग आज्ञापालन के लिए बैंकों को बढ़ावा देना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने बैंकिंग सिस्टम में जनता के भरोसे पर ज़ोर देते हुए कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की अपनी बेचैनी में, बैंकों को यह याद रखना चाहिए कि वे जनता का पैसा भरोसे के तौर पर रखते हैं। उन्होंने कहा, "लोग पैसा इसलिए जमा करते हैं क्योंकि उन्हें बैंकों पर भरोसा होता है। ये बैंक जनता के लिए एक बड़ी देनदारी बनते जा रहे हैं, और अदालतें तेज़ी से उनके लिए रिकवरी एजेंट बनती जा रही हैं।" उन्होंने लापरवाही से लोन देने के तरीकों और उसके बाद की रिकवरी की कार्रवाई का भी ज़िक्र किया।

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