बेंगलुरु , नवंबर 04 -- कर्नाटक उच्च न्यायालय में मंगलवार को बैंकों के संघ ने भगोड़े व्यवसायी विजय माल्या की किंगफिशर के वसूले गए बकाया पर ब्याज दरों को रोकने के अनुरोध करने वाली याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अब तक की गई सभी वसूलियाँ अस्थायी हैं और माल्या किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।
न्यायमूर्ति ललिता कन्नेगंती के समक्ष बैंकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम हुइलगोल ने माल्या द्वारा दायर रिट याचिका पर सवाल उठाया।
अधिवक्ता हुइलगोल ने तर्क दिया कि एक व्यक्ति जिसे भगोड़ा घोषित किया गया है, जिसने किसी भी लंबित कार्यवाही में भाग नहीं लिया है और जो चुनिंदा रूप से अदालत का रुख करता है, वह अनुच्छेद 226 के तहत विवेकाधीन राहत की मांग नहीं कर सकता। उन्होंने दलील दी कि ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के तहत की गई वसूली केवल "अस्थायी" थी, क्योंकि पीएमएलए अदालत के समक्ष बैंकों ने बॉन्ड अंडरटेकिंग दी थी, जिसके तहत उन्हें अंतिम निर्णय तक कुर्क की गई संपत्तियों और प्राप्त धनराशि को अस्थायी मानना था।
उन्होंने आगे कहा, "बैंक वैधानिक योजना से बंधे हैं और पीएमएलए और परिसमापन कार्रवाई लंबित रहने तक वसूली को अंतिम नहीं मान सकते।"माल्या की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता साजन पूवैया ने तर्क दिया कि बैंकों ने 6,203 करोड़ रुपये के मूल डीआरटी प्रमाणपत्र के विरुद्ध 11.5 प्रतिशत ब्याज के साथ 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की वसूली पहले ही कर ली थी, और इसलिए, आगे ब्याज वसूलना अनुचित था। उन्होंने जुलाई 2021 की ईडी प्रेस विज्ञप्ति और वित्त मंत्रालय की रिपोर्टों सहित आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की कुर्क की गई संपत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वापस कर दी गई है। उन्होंने कहा कि माल्या की याचिका केवल खातों का विवरण मांगने तक सीमित थी, जिसमें अब तक की गई कुल वसूली और समायोजन का विवरण हो।
आधिकारिक परिसमापक की ओर से वकील कृतिका राघवन ने कहा कि माल्या ने पहले परिसमापक से संपर्क नहीं किया था और कंपनी के निदेशकों के खिलाफ कई कार्यवाही अभी भी लंबित हैं। उन्होंने कहा कि परिसमापक सभी चल रहे मामलों की स्थिति का विवरण देते हुए आपत्तियां दर्ज करेगा।
उच्च न्यायालय ने आधिकारिक परिसमापक को 10 नवंबर तक आपत्तियां दर्ज करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 12 नवंबर को तय की।
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