अमृतसर , अप्रैल 13 -- पंजाब प्रदेश भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के प्रवक्ता प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने सोमवार को पंजाब विधानसभा में बेअदबी से संबंधित संशोधन विधेयक को सर्वसम्मति से पारित किए जाने का स्वागत किया है।

प्रो ख्याला ने हालांकि यह सवाल भी उठाया कि कि यदि मान सरकार वास्तव में बेअदबी के मामलों में गंभीर है, तो वह यह स्पष्ट करे कि 24 घंटे में न्याय का वादा करने वाली सरकार आज अदालत में ट्रायल रोकने पर सहमत क्यों हो रही है? यह दोहरा मापदंड क्यों? उन्होंने कहा कि 29 अप्रैल 2025 को शीर्ष अदालत में सरकार के वकीलों ने आरोपी पक्ष के वकीलों के साथ मिलकर बेअदबी मामलों में निचली अदालत की कार्यवाही रोकने पर सहमति दी, जिसके आधार पर अगली कार्यवाही पर रोक लगी। यदि सरकार खुद ही न्याय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय रोकती दिखाई दे, तो उसकी नियत पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? सरकार यह भी बताए कि फरीदकोट बेअदबी से संबंधित पांच केस अन्य जगह स्थानांतरित (ट्रांसफर) करने पर राज्य सरकार खामोश क्यों रही।

उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों में बेअदबी के 597 मामले सामने आए, लेकिन परिणाम क्या निकला? अधिकांश मामले रफा-दफा हो गए, 131 केस अदालतों में लटके हुए हैं, और एक प्रतिशत से भी कम मामलों में मामूली सजा हुई। दोषी बचते रहे और न्याय अभी भी कोसों दूर नजर आ रहा है।

विधानसभा की कार्यवाही पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि स्पीकर से निष्पक्षता की उम्मीद होती है, लेकिन आज वह सत्ता पक्ष के प्रतिनिधि के रूप में नजर आए। सबसे निराशाजनक बात यह रही कि बेअदबी मामलों को अदालतों तक पहुँचाने तक ही सीमित रखकर उन्होंने अंतिम न्याय तक ले जाने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

प्रो. ख्याला ने कहा कि उम्मीद थी कि बेअदबी जैसे संवेदनशील मामले पर विधेयक किसी 'अमृतधारी गुरसिख' द्वारा पेश किया जाएगा, लेकिन हैरानी की बात है कि यह उस मुख्यमंत्री की ओर से पेश किया गया, जो खुद बेअदबी के एक मामले में श्री अकाल तख्त साहिब पर आरोपों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विधेयक पर प्रथम चर्चा मंत्री हरजोत सिंह बैंस द्वारा की गई, जो बेअदबी के दोषियों की वकालत करने के लिए जाने जाते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि बैंस द्वारा पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के संबंध में किया गया दावा निराधार है और इससे सदन को गुमराह किया गया।

उन्होंने कहा कि बेअदबी जैसे संवेदनशील और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामले पर सरकार द्वारा फिर से जल्दबाजी में बिल लाना यह दर्शाता है कि सरकार ने अतीत से कोई सबक नहीं लिया। वर्ष 2016 में अकाली-भाजपा सरकार के दौरान इसी प्रकृति का बिल सर्वसम्मति से पारित किया गया था, लेकिन उसे संवैधानिक सिद्धांतों-विशेषकर धर्मनिरपेक्षता-के खिलाफ मानते हुए राष्ट्रपति द्वारा वापस कर दिया गया था। फिर 2018 में कैप्टन सरकार ने संशोधन करके वह बिल दोबारा भेजा, लेकिन केंद्रीय कानूनों के साथ टकराव के कारण वह भी कानून का रूप नहीं ले सका।

प्रो. ख्याला ने कहा कि 14 जुलाई 2025 को पेश किया गया "पंजाब पवित्र ग्रंथों के विरुद्ध अपराध रोकथाम विधेयक-2025", जिसे सिलेक्ट कमेटी के हवाले किया गया था, उस पर 6 महीने में रिपोर्ट आनी थी। लेकिन 9 महीने बाद भी रिपोर्ट के बजाय 6 महीने का समय और बढ़ा दिया गया-यह सरकार की नियत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या सरकार सच्चाई से भाग रही है या जानबूझकर मामले को लटका रही है?उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यह नया बिल एक और संवैधानिक टकराव पैदा कर सकता है। यदि राज्य कानून केंद्रीय कानून (बीएनएस) से टकराएगा, तो इसकी कानूनी मजबूती पर सवाल खड़े होंगे। यदि यह बिल राष्ट्रपति स्तर पर अटक जाता है या अदालतों में रद्द हो जाता है, तो इससे लोगों की धार्मिक भावनाओं और न्याय प्रणाली पर भरोसे, दोनों पर बुरा असर पड़ेगा।उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या इस एक्ट के मामलों की अपील हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक हो सकेगी? यदि केस पंजाब से बाहर ट्रांसफर होते हैं, तो क्या यह कानून वहां भी लागू रहेगा?उन्होंने कहा कि यदि ये बुनियादी कानूनी सवाल अनसुलझे रहते हैं, तो यह बिल सिर्फ एक 'राजनीतिक दिखावा' बनकर रह जाता है-जिसका मकसद न्याय नहीं, सिर्फ वोटों की राजनीति है।

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