बीजापुर , फरवरी 12 -- छत्तीसगढ़ के बीजापुर में कभी नक्सली हिंसा में शामिल एक युवक आज अपने पसीने की कमाई से सम्मानजनक जीवन जी रहा है। आर्थिक तंगी, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन के बीच पला-बढ़ा राजेश (परिवर्तित नाम) आज आत्मनिर्भर जीवन की मिसाल बन चुका है। बीजापुर जिले के एक सुदूर गांव में जन्मे राजेश के जीवन की शुरुआत संघर्षों से भरी रही। परिवार की आजीविका मुख्यतः कृषि मजदूरी पर निर्भर थी, जिससे बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति भी मुश्किल से हो पाती थी।

जिला पीआरओ से गुरुवार को मिली जानकारी के अनुसार,वर्ष 2009 में पिता और वर्ष 2016 में माता के निधन ने उसकी पारिवारिक स्थिति को और अधिक दयनीय बना दिया। कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए राजेश के सामने रोजी-रोटी का संकट गहरा गया। उसी दौरान क्षेत्र में सक्रिय नक्सली गतिविधियों, स्थानीय दबाव और आर्थिक मजबूरियों के चलते राजेश वर्ष 2023 में नक्सली संगठन के संपर्क में आया।

धीरे-धीरे वह संगठन की विचारधारा से प्रभावित होकर अवैध और हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल हो गया। इस दौरान उसका जीवन भय, असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य से घिर गया। वह लगातार पुलिस मुठभेड़ और सुरक्षाबलों की कार्रवाई के डर से जी रहा था। उसे यह एहसास होने लगा कि न तो यह रास्ता सुरक्षित है और न ही इसमें कोई सकारात्मक भविष्य छिपा है। वह अपने परिवार को सुरक्षित और बेहतर जीवन देना चाहता था।

शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर राजेश ने मार्च 2025 में स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर दिया। जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ने उसे नक्सली हिंसा से मुक्ति दिलाते हुए मुख्यधारा से जोड़ने की पहल शुरू की। आत्मसमर्पण के बाद शासन द्वारा निर्धारित पुनर्वास प्रक्रिया के अंतर्गत उसे बीजापुर स्थित पुनर्वास केंद्र में रखा गया।

यहां उसे न केवल आवश्यक परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहयोग दिया गया, बल्कि कौशल उन्नयन के अवसर भी प्रदान किए गए। पुनर्वास केंद्र में उसकी रुचि को देखते हुए उसे राजमिस्त्री (मेसन) का प्रशिक्षण दिया गया। कुछ ही महीनों के प्रशिक्षण में राजेश ने निर्माण कार्य से संबंधित तकनीकी दक्षता हासिल कर ली। प्रशिक्षण के दौरान उसकी मेहनत और सीखने की ललक ने अधिकारियों को भी प्रभावित किया।

प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद राजेश को तेलंगाना राज्य के मुलुगु जिले में निर्माण कार्य के लिए भेजा गया। वह वर्तमान में एक कुशल मजदूर के रूप में कार्यरत है और प्रतिदिन 600 रुपये की मजदूरी अर्जित कर रहा है। अपने श्रम और लगन के बल पर वह न केवल आत्मनिर्भर जीवन जी रहा है, बल्कि अपने परिवार का भी भरण-पोषण कर रहा है। राजेश अब एक सम्मानजनक जिंदगी जी रहा है और समाज की मुख्यधारा से सफलतापूर्वक जुड़ चुका है।

राजेश की इस बदली हुई जिंदगी पर प्रतिक्रिया देते हुए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि शासन की आत्मसमर्पण नीति न केवल नक्सलियों को हिंसा का रास्ता छोड़ने का अवसर देती है, बल्कि उन्हें दोबारा सम्मानजनक जीवन जीने के लिए हर संभव सहायता भी प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि राजेश का पुनर्वास इस बात का प्रमाण है कि यदि भटके हुए युवाओं को समय पर सही मार्गदर्शन और कौशल प्रशिक्षण मिले तो वे हिंसा का मार्ग त्यागकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं।

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