नयी दिल्ली , दिसंबर 19 -- उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को शिरोमणि अकाली दल के नेता एवंं पंजाब के पूर्व कैबिनेट मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया को अंतरिम राहत देने से इनकार किया और उनकी याचिका पर पंजाब सरकार से जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मजीठिया की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में पंजाब विजिलेंस ब्यूरो द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज प्राथमिकी से जुड़े मामले में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें आय से अधिक संपत्ति के मामले में उन्हें नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
पीठ ने मजीठिया की अंतरिम जमानत की मांग को स्वीकार नहीं किया और संकेत दिया कि मामले की अगली सुनवाई 19 जनवरी को हो सकती है।
मजीठिया की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलील दी कि भ्रष्टाचार का यह मामला आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि आरोप उन वित्तीय लेन-देन पर आधारित हैं, जिनकी पहले एनडीपीएस मामले में जांच हो चुकी थी और उसमें मजीठिया को जमानत मिल चुकी थी। उन्होंने बताया कि उच्चतम न्यायालय ने एनडीपीएस मामले में दी गई जमानत को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की याचिका को पहले ही खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि एनडीपीएस कार्यवाही के दौरान राज्य ने एक पूरक हलफनामा दायर किया था, जिसमें कुछ वित्तीय लेन-देन का उल्लेख था। अब उसी सामग्री का उपयोग अलग भ्रष्टाचार मामले को न्यायोचित ठहराने के लिए किया जा रहा है। अंतरिम जमानत की मांग करते हुए श्री मुरलीधर ने कहा कि जमानत से इनकार का आधार यह था कि आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ थी, लेकिन इसके तुरंत बाद इसे दाखिल कर दिया गया।
मजीठिया के खिलाफ प्राथमिकी पहले एनडीपीएस मामले से जुड़ी विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा 7 जून 2025 को दी गई रिपोर्ट पर आधारित है। एसआईटी ने आरोप लगाया है कि मजीठिया और उनकी पत्नी ने घरेलू और विदेशी इकाइयों के जटिल नेटवर्क के माध्यम से अपनी ज्ञात आय स्रोतों से अधिक 540 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति अर्जित की। आरोप 2007 से 2017 की अवधि से संबंधित हैं, जब मजीठिया पंजाब में विधायक और बाद में कैबिनेट मंत्री थे।
इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य की दलील स्वीकार की कि मजीठिया कई कॉर्पोरेट इकाइयों, जिसमें सराया इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उसकी सहायक कंपनियां शामिल हैं, पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण रखते थे।
अभियोजन पक्ष ने अनजाने नकद प्रवाह, साइप्रस और सिंगापुर स्थित इकाइयों के माध्यम से रूट किए गए विदेशी निवेश और इंटर-कॉर्पोरेट लेन-देन का आरोप लगाया, जिनका उपयोग कथित तौर पर बेनामी संपत्ति अर्जित करने के लिए किया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपनी आधिकारिक स्थिति का दुरुपयोग परिवार के सदस्यों और फ्रंट कंपनियों के माध्यम से शराब, परिवहन और विमानन जैसे क्षेत्रों में व्यावसायिक हितों का विस्तार करने के लिए किया। उच्च न्यायालय के समक्ष मजीठिया ने दावा किया था कि भ्रष्टाचार का मामला एनडीपीएस कार्यवाही का ही विस्तार है और एक ही तथ्यों पर दूसरी एफआईआर नहीं चल सकती। उन्होंने राजनीतिक बदले की भावना का भी आरोप लगाया और बताया कि जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है तथा 22 अगस्त 2025 को एक विस्तृत चार्जशीट दायर की जा चुकी है।
उच्च न्यायालय ने हालांकि माना कि जहां जांच से अलग अपराध या व्यापक साजिश का पता चलता है, वहां दूसरी प्राथमिकी वैध है।न्यायालय ने यह भी कहा कि आर्थिक अपराध जमानत के उद्देश्य से अलग श्रेणी में आते हैं और मजीठिया की राजनीतिक हैसियत को देखते हुए रिहाई पर गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है।
उच्च न्यायालय ने जमानत याचिका खारिज करते हुए जांच एजेंसी को शेष जांच तीन महीने में पूरी करने का निर्देश दिया और मजीठिया को इसके बाद नयी जमानत याचिका दायर करने की छूट दी।
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