जगदलपुर , मार्च 07 -- छत्तीसगढ़ और तेलंगाना राज्य में सक्रिय 130 नक्सलियों ने आज तेलंगाना में आत्म समर्पण किया है। बस्तर रेंज के आईजी ने आत्मसमर्पण को बार- बार की जा रही अपील, देश भर के सुरक्षाबलों की सख्त कार्रवाई और आकर्षक पुनर्वास नीति को कारण बताया है। आत्मसमर्पण करने वाले सभी नक्सली दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी, तेलांगना राज्य कमेटी और पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के सदस्य थे। 124 हथियारों के साथ 130 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है।

बस्तर रेंज के आई जी पी सुंदरराज से मिली जानकारी के अनुसार, आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों ने 124 हथियारों के साथ भारी मात्रा में गोला-बारूद भी सुरक्षा बलों के समक्ष जमा कराया है। यह घटनाक्रम वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ जारी अभियान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रही है। बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण से माओवादी संगठन के ढांचे को गहरा झटका लगा है। यह स्पष्ट रूप से सीपीआई (माओवादी) के कमजोर होते संगठनात्मक ढांचे और उसके कैडरों के बीच बढ़ती निराशा को दर्शाता है।

यह ऐतिहासिक घटनाक्रम पिछले कई महीनों से छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड सहित अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे समन्वित अभियानों का परिणाम है। लगातार आसूचना आधारित अभियान, सुरक्षा तंत्र के विस्तार और दूरस्थ क्षेत्रों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस की स्थापना से माओवादी कैडरों की संचालन क्षमता और उनकी आवाजाही पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।

बस्तर क्षेत्र और उससे सटे वन क्षेत्रों में सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे सतत और केंद्रित अभियानों ने माओवादी गढ़ों को धीरे-धीरे ध्वस्त किया है। इन अभियानों से उनके संगठनात्मक नेटवर्क को बाधित किया गया है, जिससे कैडरों पर हिंसा का रास्ता छोड़ने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। माओवादी संगठन की विचारधारा से मोहभंग और सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव ने कई कैडरों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया है।

सुरक्षा प्रयासों के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के उद्देश्य से विभिन्न विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, आजीविका के अवसरों तथा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर विशेष ध्यान देने से पहले से अलग-थलग पड़े गांवों तक धीरे-धीरे शासन की पहुँच बढ़ी है।

विकास कार्यों के विस्तार से स्थानीय समुदायों का लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास मजबूत हुआ है और जनसामान्य के बीच माओवादी प्रचार के प्रभाव में कमी आई है। अब आदिवासी युवा विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं, न कि हिंसा के रास्ते पर चलना। सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं और योजनाओं ने उनका विश्वास जीता है।

इतनी बड़ी संख्या में माओवादी कैडरों का मुख्यधारा में लौटना इस बात का संकेत है कि माओवादी संगठन के भीतर भी यह समझ विकसित हो रही है कि हिंसा की विचारधारा अब बेमानी हो चुकी है। यह दर्शाता है कि कठोर सुरक्षा कार्रवाई के साथ समावेशी विकास और कल्याणकारी पहलों को मिलाकर अपनाई गई संतुलित रणनीति उग्रवादी आंदोलनों को प्रभावी रूप से कमजोर कर सकती है। जैसे-जैसे शासन की पहुँच बढ़ रही है और सुरक्षा बल उग्रवादी नेटवर्क पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं, क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की संभावनाएँ और मजबूत होती जा रही हैं।

बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुन्दरराज पट्टलिंगम ने इस ऐतिहासिक आत्मसमर्पण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बड़ी संख्या में माओवादी कैडरों और उनके नेतृत्व द्वारा हिंसा का मार्ग त्यागकर मुख्यधारा में शामिल होने का निर्णय दूरस्थ क्षेत्रों में शासन की बढ़ती पहुँच तथा सुरक्षा बलों के लगातार चलाए जा रहे अभियानों के संयुक्त प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। उन्होंने कहा कि बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों के निरंतर प्रयासों से माओवादी संगठनात्मक ढांचा काफी कमजोर हुआ है और उनके संचालन क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी आई है।

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