सतीश सिंहलखनऊ , दिसम्बर 29 -- वर्ष 2025 बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए न तो पूरी तरह उपलब्धियों से भरा रहा और न ही पूर्ण निराशा का प्रतीक। यह साल पार्टी के लिए आत्ममंथन, संगठनात्मक पुनर्संरचना और भविष्य की रणनीति तय करने का वर्ष साबित हुआ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी निर्णायक भूमिका निभाने वाली बसपा, 2025 में अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने की जद्दोजहद में दिखाई दी। यह बात दीगर है कि जाते हुए साल ने पार्टी के नेशनल कोआर्डिनेटर आकाश आनंद के घर हाल में पैदा हुई पुत्री को बहुजन मिशन के प्रति समर्पित करने की इच्छा ने मायावती को जरूर खुशी दी।

2024 के लोकसभा चुनावों के बाद 2025 की शुरुआत बसपा के लिए चुनौतीपूर्ण रही। पार्टी को चुनावी स्तर पर अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, जिससे संगठनात्मक ढांचे और रणनीति पर सवाल खड़े हुए। भाजपा के मजबूत संगठन और समाजवादी पार्टी की आक्रामक विपक्षी राजनीति के बीच बसपा को राजनीतिक स्पेस बचाए रखने की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा। वहीं बिहार चुनाव में भी बसपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। पार्टी को केवल एक ही सीट पर संघर्ष संतोष करना पड़ा।

हालांकि, बसपा नेतृत्व ने इसे अंत नहीं बल्कि नए सिरे से खड़े होने का अवसर माना। पार्टी ने स्पष्ट किया कि वह न तो किसी दल की "बी-टीम" बनेगी और न ही अवसरवादी गठबंधनों की राजनीति करेगी। 2025 में मायावती एक बार फिर पार्टी की राजनीति के केंद्र में रहीं। उन्होंने सार्वजनिक मंचों और आंतरिक बैठकों में यह संदेश स्पष्ट किया कि बसपा का मूल उद्देश्य बहुजन समाज-दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यकों-का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण है।

मायावती ने कई बार यह दोहराया कि कांशीराम की विचारधारा से कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने संगठन को चेताया कि ढुलमुल कार्यशैली, गुटबाजी और निष्क्रियता अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके बाद प्रदेश और मंडल स्तर पर कई पदाधिकारियों में फेरबदल भी देखने को मिला। शायद यही वजह है कि मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पहले बाहर का रास्ता दिखाया, 41 दिन बाद पार्टी में वापसी की राह खोली।

वर्ष 2025 में बसपा की सबसे बड़ी कमजोरी उसका जमीनी संगठन रही। हालांकि, पार्टी ने इसे सुधारने के प्रयास किए।कई जिलों में कैडर मीटिंग्स और समीक्षा बैठकें आयोजित की गईं। कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करने के लिए बहुजन संवाद कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर पार्टी की उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश की गई, हालांकि यह प्रयास अभी भी भाजपा और सपा की तुलना में कमजोर रहा। इन गतिविधियों से यह संकेत जरूर मिला कि पार्टी निष्क्रिय नहीं है, लेकिन उसकी संगठनात्मक गति अभी धीमी बनी हुई है।

2025 में बसपा ने वैचारिक स्तर पर खुद को स्पष्ट रूप से अलग रखने की कोशिश की। भाजपा पर संविधान कमजोर करने और आरक्षण के मुद्दे पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया गया। समाजवादी पार्टी पर दलित हितों की उपेक्षा और "राजनीतिक अवसरवाद" का आरोप लगाया गया।बसपा ने अपने बयानों में बार-बार कहा कि सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार की राजनीति उसका मूल लक्ष्य है।

2025 को बसपा ने खुलकर 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में इस्तेमाल किया। पार्टी ने यह साफ कर दिया कि वह चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ेगी। उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया को पहले से मजबूत करने पर चर्चा हुई।जातिगत समीकरणों के साथ-साथ युवा और महिला मतदाताओं पर विशेष फोकस की बात कही गई। हालांकि, जमीनी स्तर पर अभी तक ऐसा कोई बड़ा जनआंदोलन नहीं दिखा, जिससे यह कहा जा सके कि पार्टी ने 2025 में निर्णायक बढ़त बना ली है।

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