(जयंत राय चौधरी से)नयी दिल्ली , फरवरी 13 -- लंदन में 17 साल के स्व-निर्वासन से लौटने के लगभग दो महीने बाद सभी उम्मीदों को धता बताते हुए तारिक रहमान ने बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को एक निर्णायक जीत दिलायी है।

इस शानदार जीत में बीएनपी ने दो-तिहाई से अधिक सीटों पर कब्जा किया और अवामी लीग पर लगे विवादास्पद प्रतिबंध के बाद बने शून्य को भर दिया। इस जीत ने शासन का कोई पिछला अनुभव न रखने वाले व्यक्ति को 17 करोड़ लोगों के राष्ट्र के प्रमुख के पद पर पहुंचा दिया है।

विरासत की राजनीति के अभ्यस्त इस देश में, श्री रहमान का उत्थान अपरिहार्य और असंभव दोनों ही महसूस हुआ। वह जियाउर रहमान के सबसे बड़े बेटे हैं, वही पूर्व सैन्य अधिकारी जिन्होंने 1971 में बंगलादेश की स्वतंत्रता की घोषणा की थी और बाद में पहले एक शासक और फिर निर्वाचित राष्ट्रपति के रूप में शासन किया। उनकी माँ खालिदा जिया दो बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं।

दशकों तक, बंगलादेश का सार्वजनिक जीवन 'बेगमों की जंग' के इर्द-गिर्द घूमता रहा, एक तरफ बेगम जिया और दूसरी तरफ बंगलादेश के संस्थापक शेख मुजीब की बेटी शेख हसीना। श्री रहमान इसी प्रतिद्वंद्विता की छाया में बड़े हुए।

नब्बे के दशक और दो हजार के दशक की शुरुआत में अपनी माँ की सरकारों के दौरान, उन्होंने कोई औपचारिक पद नहीं संभाला। लेकिन ढाका के गलियारों और मंत्रालयों में यह स्पष्ट रूप से समझा जाता था कि श्री रहमान के करीब होना उतना ही मूल्यवान हो सकता है जितना कि खुद प्रधानमंत्री के करीब होना। उनके प्रशंसक उन्हें पार्टी का रणनीतिकार और आधुनिकतावादी कहते थे, जबकि आलोचक उनके लिए 'राजकुमार' और 'गेटकीपर' जैसी शब्दावली का इस्तेमाल करते थे।

बीएनपी के 2001-2006 के कार्यकाल के दौरान लगे आरोपों के कारण 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' ने बंगलादेश को लगातार चार वर्षों तक दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश करार दिया था। 2006 में जब सरकार का कार्यकाल समाप्त हुआ, तो देश एक ऐसे चुनाव की ओर बढ़ रहा था जिस पर कम ही लोगों को भरोसा था।

एक सैन्य-समर्थित अंतरिम प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और उसके बाद हुए उथल-पुथल में श्री रहमान को गिरफ्तार कर अठारह महीने के लिए जेल भेज दिया गया। उन पर गबन, धन शोधन से लेकर अवामी लीग की रैली पर ग्रेनेड हमले में कथित संलिप्तता तक दर्जनों मामले दर्ज किए गए थे। उस दौर के लीक हुए अमेरिकी राजनयिक दस्तावेजों (केबल्स) में उन्हें बेहद तीखे शब्दों में 'बंगलादेश के सबसे भ्रष्ट व्यक्तियों में से एक' और 'खुलेआम रिश्वत मांगने के लिए कुख्यात' से लेकर 'भ्रष्ट शासन और हिंसक राजनीति का प्रतीक' बताया गया था।

एक समय के लिए जब उनका राजनीतिक करियर खत्म होता दिख रहा था तब वह इलाज के बहाने लंदन चले गए और वहीं रहकर बयान देते रहे और वहीं से पार्टी के मामलों का मार्गदर्शन करते रहे। श्री रहमान के खिलाफ कई मामले मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान रद्द कर दिये गये या वापस ले लिए गये। यह तब हुआ जब श्री यूनुस ने बीएनपी समर्थकों के सड़क पर उतरने के बाद ब्रिटेन की यात्रा की और श्री रहमान से मुलाकात की। उस मुलाकात में क्या हुआ यह रहस्य बना हुआ है, लेकिन मामले वापस ले लिए गए और 'राजकुमार' अंततः तब घर लौटे जब उनकी माँ मृत्युशय्या पर थीं।

यदि निर्वासन ने उनकी छवि को कुछ नरम किया है, तो जिस देश में वह लौटे हैं वह बिल्कुल भी सहज नहीं है। बंगलादेश की लगभग आधी कपड़ा फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं या बंद होने के कगार पर हैं। मुद्रास्फीति ने घरेलू आय को खा लिया है, मुद्रा कमजोर हुई है, विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए लगाए गए आयात प्रतिबंधों ने विनिर्माण को प्रभावित किया है और ऊर्जा आपूर्ति बाधित की है।

भारत के साथ एक छोटे लेकिन प्रतीकात्मक रूप से शक्तिशाली आयात शुल्क विवाद ने रोजमर्रा की वस्तुओं को महंगा बना दिया है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा जबरन वसूली और जमीन हड़पने की शिकायतें बढ़ी हैं। इसी बेचैनी, थकान और व्यवस्था की भूख के बीच श्री रहमान ने कदम रखा है।

रैलियों में उन्होंने 'देश में शांति' लाने और 'सभी वर्गों' तथा सभी धर्मों के नागरिकों की रक्षा करने का वादा किया। यहाँ तक कि भारत के संदर्भ में भी उनके सुर नपे-तुले रहे हैं, हालांकि उनकी पार्टी भारत पर 'बड़े भाई' जैसा व्यवहार करने का आरोप लगाती रही है। उन्होंने जल-बंटवारे और संप्रभुता के बारे में उन स्वरों में बात की है जो घरेलू संवेदनशीलता के अनुरूप हैं, यानि कि शत्रुता को बढ़ावा दिये बिना मुद्दों को सुलझाना। एक ऐसे राजनेता के लिए जिसे लंबे समय से आवेगी और अहंकारी बताया जाता रहा है, यह संयम उल्लेखनीय है।

कई बंगलादेशियों के लिए श्री रहमान न केवल बदलाव की संभावना का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की वापसी का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे वे अच्छी रूप में याद करते हैं। अवामी लीग की अनुपस्थिति में लामबंद हुए मध्यम वर्ग और महिला मतदाताओं ने प्रतिशोध के बजाय स्थिरता पर दांव लगाते हुए उन्हें मत दिया है।

जमात-ए-इस्लामी का बढ़ता हुआ वोट बैंक एक संभावित बाधा बना हुआ है, जो यह याद दिलाता है कि बंगलादेश की वैचारिक दरारें सतह से ज्यादा दूर नहीं हैं। लेकिन वह एक ऐसी लड़ाई होगी जिसे उन्हें किसी और दिन लड़ना होगा।

फिलहाल, श्री रहमान का कार्य इस अशांत भूमि में शांति लाना, पिछले शासन की अकुशलता से उपजी अनावश्यक शत्रुता से नाराज पड़ोसियों को संतुष्ट करना और व्यापारिक सौदों को पटरी पर लाना है ताकि एक समय तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को फिर से आकार में लाया जा सके।

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