कोलकाता , जनवरी 13 -- लेखिका और सामाजिक टिप्पणीकार शोभा डे ने आयु के आधार पर भेदभाव और लैंगिक अपेक्षाओं के खिलाफ आवाज उठाते हुए कहा है कि एक निश्चित उम्र की महिलाएं अगर अपनी स्त्री-सुलभ इच्छाओं या सौंदर्यबोध को अभिव्यक्त करें तो उसे लेकर भारतीय समाज आज भी असहज हो उठता है।

17वें एपीजे कोलकाता साहित्य महोत्सव में एक बातचीत में सुश्री डे ने कहा कि इस तरह की सामाजिक सोच महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ उनकी पहचान और इच्छा को छीन लेती है।

उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ना हालांकि सार्वभौमिक रूप से कठिन है, लेकिन महिलाओं के लिए खासतौर से निर्मम है। हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां उम्र के आधार पर बहुत भेदभाव होता है, न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में बूढ़ा होना एक तरह का अपराध है। महिलाओं के मामले में दुनिया बेहद क्रूर हो सकती है। यहां एक रूढ़िवादी धारणा बनी हुई है कि आपको बढ़ती उम्र के साथ 'लीला मिश्रा' जैसी एक सीधी-सादी और नुकसान न पहुंचाने वाली दादी की छवि में ढल जाना चाहिए।

सुश्री डे ने गौर किया कि महिलाओं को उनके जीवन के दौरान कमतर भूमिकाओं में डाला जाता है, जो उम्र के साथ-साथ और भी और भी सिमटती चली जाती हैं। उन्होंने कहा, "समाज अधिकतर महिलाओं को अदृश्य बना देता है। एक निश्चित उम्र के बाद उन्हें बस देखा ही नहीं जाता। मानो उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया हो, उनकी उपस्थिति दर्ज ही नहीं होती। वे किसी कमरे में प्रवेश करती हैं तो पूरी संभावना होती है कि उनकी मौजूदगी को ही नजरअंदाज कर दिया जाए।"78 वर्षीय स्तंभकार ने कहा कि लोकप्रिय संस्कृति उम्रदराज महिलाओं को दो चरम सीमाओं में समेट देती है या तो वे 'स्त्री सुलभ इच्छाओं से रहित दादी' बना दी जाती हैं या फिर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर कम उम्र के पुरुषों के प्रति आकर्षित होने वाली महिला के रूप में दिखाया जाता है। यह स्थिति महिलाओं के सूक्ष्मतम और वास्तविक चित्रण के लिए बहुत कम जगह छोड़ती है।

हमारा समाज एक निश्चित उम्र की महिलाओं को अपनी शारीरिक इच्छाओं, सौंदर्य या किसी भी तरह के आकर्षण को प्रकट करने के लिए बिल्कुल भी प्रोत्साहित नहीं करता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि समाज के लिए ऐसी महिलाओं को स्वीकार करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण और डराने वाला होता है। समाज समझ ही नहीं पाता कि उन्हें किस सांचे में अटाया जाए? यहां हर महिला को उसके जन्म के समय से ही एक तयशुदा भूमिका दे दी जाती है।

नारीवादी समर्थक और स्त्री विषयक संवेदनशील विषयों पर अपनी बेबाक बयानों के लिए मशहूर लेखिका ने कहा, "एक बार जब महिला के बच्चे हो जाते हैं, जब वह दादी या नानी बन जाती है, तो आप उसके साथ क्या करते हैं?" रूढ़ सामाजिक ढांचे पर टिप्पणी करते हुए कहा, "तब उसके लिए यही बेहतर है कि वह घर पर रहे, अपने काम से काम रखे और दुनिया के झमेलों से दूर रहे। मेरा मतलब है कि वह बाकी दुनिया को उसके हाल पर छोड़ दे और मुमकिन हो तो वहीं बैठकर अपने पोते-पोतियों के लिए कश्मीरी शॉल जैसा कुछ बुने।

सुश्री डे ने जोर देकर कहा कि आकर्षण और शारीरिक इच्छाएं एक समान नहीं हैं और अक्सर गलत तरीके से मिलाये जाते हैं। उन्होंने आकर्षण को जीवन की सरल सुखों की तीव्र जागरूकता के रूप में वर्णित किया, जैसे गंध, स्पर्श, स्वाद और भावनात्मक निकटता, न कि सिर्फ यौन अभिव्यक्ति के रूप में।

सुश्री डे ने स्पष्ट किया कि वह शयनकक्ष की अंतरंगता की बात नहीं कर रही हैं, "यह सुंदरता, स्पर्श, सुगंध, भोजन आदि के बारे में है।

उन्होंने कहा, "यह रोजाना की छोटी-छोटी उन गतिविधियों के बारे में है, जो आप अपने परिवार के साथ और निश्चित रूप से अपने साथी के साथ साझा करते हैं। ये छोटी-छोटी चीजें आपके जीवन को अद्भुत तरीके से बेहतर बना सकती हैं। इसके लिए बस सचेत होने की जरूरत है। कभी न कभी हमने इस बात के प्रति जागरूक होने का अपना रास्ता खो दिया था। हम किसी भी मोड़ पर उस चीज की ओर वापस लौट सकते हैं, जो अनमोल थी, वास्तव में किसी ऐसी चीज की ओर जो इतनी समृद्ध थी कि उसने हमें खुशियों से सराबोर कर दिया था।

शारीरिक बनावट के प्रति जुनून की बात करते हुए सुश्री डे ने कहा कि महिलाओं के शरीर को लेकर जो अपेक्षाएं हैं, वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलती रहती हैं। उन्होंने आगे कहा कि कॉस्मेटिक सर्जरी या कृत्रिम उपचार अब पहले से कहीं अधिक सुलभ हो सकते हैं, लेकिन वे आत्म-सम्मान से जुड़ी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं करते।

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