नयी दिल्ली , फरवरी 01 -- कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से रविवार को पेश केन्द्रीय बजट को नीतिगत खालीपन, दूरदर्शिता तथा दिशाहीन करार देते हुए कहा है किआर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों से निपटने के इसमें कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

श्री खरगे ने सोशल मीडिया एक्स पर कहा "बजट 2026-27 से साबित होता है कि इसमें देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों के समाधान के लिए कोई उपाय नहीं किए गये हैं। बजट में चुनौतियों का ठोस समाधान करने के लिए कोई सुझाव नहीं दिए गये हैं। सरकार का 'मिशन मोड' अब 'चुनौती मार्ग'बन चुका है और 'रिफॉर्म एक्सप्रेस' किसी भी सुधार वाले स्टेशन पर रुकने से कतराता दिख रहा है। नतीजा यह है कि बजट में न तो कोई स्पष्ट नीतिगत विजन दिखता है और न ही कोई मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति। "उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में अन्नदाता किसानों को अभी तक कोई सार्थक कल्याण योजना या आय सुरक्षा का प्रावधान नहीं मिला है। असमानता ब्रिटिश राज के स्तर को भी पार कर चुकी है लेकिन बजट में इसका जिक्र तक नहीं है और न ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग या अल्पसंख्यक समुदायों के लिए कोई विशेष सहायता का प्रावधान किया गया है।

श्री खरगे ने कहा कि वित्त आयोग की सिफारिशों से लगता है कि राज्यों को कोई वास्तविक राहत मिलने वाली नहीं है। इसका यह भी मतलब हुआ कि वित्तीय संकट से जूझ रहे राज्यों की स्थिति और खराब हो सकती है और संघवाद की भावना को गहरी चोट पहुंच रही है। बजट में कई बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दों को महत्व नहीं दिये जाने पर उन्होंने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र का पुनरुद्धार नहीं हो रहा और यह अब भी 13 प्रतिशत पर अटका हुआ है। इसी तरह से 'मेक इन इंडिया' का कोई ठोस परिणाम नहीं दिख रहा है।

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि बजट में युवाओं के लिए रोजगार सृजन या महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ाने की कोई गंभीर योजना नहीं है। पहले चलाई गई इंटर्नशिप और स्किल डेवलपमेंट योजनाओं का क्या नतीजा निकला, इस पर भी कोई जवाब नहीं दिया गया है। निर्यात में लगातार गिरावट, व्यापार घाटा, टैरिफ जोखिम और वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी घटने पर कोई नीति नहीं दिखती। रुपए की गिरावट को रोकने या उससे निपटने का भी कोई जिक्र नहीं है। गरीब और मध्यम वर्ग को महंगाई से कोई राहत नहीं मिली, बचत घट रही है, कर्ज बढ़ रहा है और मजदूरी ठहरी हुई है। उपभोक्ता मांग को फिर से पटरी पर लाने का भी कोई प्रयास नहीं हुआ और निजी निवेश में विश्वास की कमी बनी हुई है क्योंकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और मजदूरी में स्थिरता को नजरअंदाज किया गया है। सिर्फ छोटे-मोटे बदलावों के अलावा कोई संरचनात्मक सुधार बजट में नहीं किए गए हैं।

श्री खरगे ने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र के वादे बार-बार दोहराए जाते हैं लेकिन डिलिवरी लगभग शून्य है। शहर अभी भी रहने लायक नहीं बन पाए हैं और स्मार्ट सिटी का सपना अधूरा पड़ा है। सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी कोई बड़ी घोषणा नहीं की गई। मनरेगा की जगह लाए गए नए कानून के लिए आवंटन का एक शब्द भी नहीं है। कुल मिलाकर यह है कि बजट न तो समस्याओं का समाधान देता है और न ही उनकी कमी को छिपाने के लिए कोई नया नारा या स्लोगन पेश करता है। यह पूरी तरह से नीतिगत खालीपन और दूरदर्शिता की कमी को उजागर करने वाला बजट है।

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