( एफ एम शाहीन से)ढाका , दिसंबर 27 -- हाल ही में बंगलादेश के सबसे प्रमुख सांस्कृतिक संस्थानों में से एक छायानत पर हुए हमलों को सांस्कृतिक इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक बंगाली पहचान और देश की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद पर वैचारिक हमले के रूप में देख रहे हैं।

इन हमलों को अलग-थलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे संकट के लक्षण के रूप में माना जा रहा है, जिसमें जिहादी उग्रवाद की बढ़त, राजनीतिक अस्पष्टता और सांस्कृतिक बहुलता का क्षरण शामिल है।

1961 में स्थापित छायानत पाकिस्तान के सैन्य शासन के दौरान सांस्कृतिक प्रतिरोध केंद्र के रूप में उभरा था। उस समय जब बंगाली भाषा और कलात्मक अभिव्यक्ति को हतोत्साहित किया या दबाया जाता था, यह संगठन मानवता, बहुलता और बौद्धिक स्वतंत्रता पर आधारित विशिष्ट सांस्कृतिक चेतना को दृढ़ करने की कोशिश करता था।

इसका गठन रबींद्रनाथ टैगोर की जन्म शताब्दी के सफल आयोजन के बाद हुआ। यह एक ऐसा कार्यक्रम था, जिसे आधिकारिक विरोध के बावजूद आयोजित किया गया था। इसे कई लोग पाकिस्तानी राज्य के खिलाफ सांस्कृतिक विरोध में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानते हैं।

न्यायमूर्ति महबूब मुर्शीद, प्रोफेसर गोविंद चंद्र देव, कवयित्री सूफिया कमाल, वाहिदुल हक और संजीदा खातून सहित प्रमुख बुद्धिजीवी और सांस्कृतिक हस्तियों ने इस शुरुआती आंदोलन में अहम भूमिका निभायी थी।

जहां टैगोर का संगीत और दर्शन इसकी शुरुआती बुनियाद थी, वहीं छायानत का व्यापक लक्ष्य एक गैर-संप्रदायिक बंगाली भावना को पोषित करना और आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करना था। विश्लेषकों का तर्क है कि यही सोच छायानत को इस्लामी चरमपंथी समूहों के साथ सीधे वैचारिक टकराव में डालती है।

पहचान के उन ढांचों के विपरीत जो धार्मिक विशिष्टता को प्राथमिकता देते हैं, छायानत की ओर से कायम की गयी सांस्कृतिक परंपरा मानवीय गरिमा और सांस्कृतिक जुड़ाव को सांप्रदायिक जुड़ाव से ऊपर रखती है। यह उन चरमपंथी विचारधाराओं के विपरीत है, जो कठोर धार्मिक मान्यताओं के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान को फिर से परिभाषित करना चाहती हैं।

ऐतिहासिक रूप से, सांस्कृतिक स्थान अक्सर चरमपंथी आंदोलनों के पहले लक्ष्यों में से रहे हैं। संगीत, कविता, रंगमंच और त्योहार आलोचनात्मक जुड़ाव और सामूहिक आत्मविश्वास को बढ़ावा देते हैं, ये ऐसे गुण हैं, जो डर पर आधारित राजनीतिक लामबंदी को चुनौती देते हैं।

रबीन्द्रनाथ टैगोर, काजी नजरुल इस्लाम और लालन फकीर जैसी हस्तियों की ओर से आकार दी गयी बंगाली सांस्कृतिक परंपराएं, मानवतावाद, असहमति और आध्यात्मिक खोज पर जोर देने के कारण धार्मिक कट्टरता का खास तौर पर विरोध करती हैं।

छायानत का सालाना 'पहला बैशाख' सुबह का प्रदर्शन लंबे समय से इस समावेशी पहचान का जाना-पहचाना प्रतीक रहा है और सालों से इसे बार-बार धमकियों का सामना करना पड़ा है। सांस्कृतिक जानकारों का कहना है कि ये हमले सिर्फ एक संस्था पर नहीं, बल्कि साझा बहु-बंगाली पहचान के विचार पर हैं।

1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान, छायानत ने किसी राजनीतिक या सशस्त्र संगठन के तौर पर काम नहीं किया था। हालांकि, गानों, कविताओं और चर्चाओं के जरिये इसने उस सांस्कृतिक जागृति में अहम योगदान दिया, जो राष्ट्रवादी आंदोलन का आधार थी।

आजादी के बाद, संगठन ने सांस्कृतिक शिक्षा से आगे बढ़कर अपनी भूमिका का विस्तार किया, प्राकृतिक आपदाओं और अकाल के दौरान राहत कार्यों में हिस्सा लिया और अक्सर नुक्कड़ नाटकों के जरिये फंड इकट्ठा किया। इस निरंतर सामाजिक भागीदारी ने छायानत को नैतिक प्रतिष्ठा दी, जो इसे एक प्रभावशाली सार्वजनिक संस्था बनाती है।

बंगलादेश का वर्तमान राजनीतिक माहौल चिंता बढ़ा रहा है। 5 अगस्त 2024 से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों, महिलाओं पर हिंसा, पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हमले और सांस्कृतिक तथा मुक्ति संग्राम के प्रतीकों के विरुद्ध तोड़फोड़ की खबरों ने नागरिक समाज के समूहों में चिंता बढ़ा दी है।

कई विश्लेषक इसे भय पैदा करने, असहमति दबाने और राज्य की वैचारिक दिशा को पुनर्परिभाषित करने की योजना के पैटर्न के रूप में देखते हैं।

इस संदर्भ में, छायानत को लक्ष्य बनाना ऐसे स्थानों को खत्म करने के प्रयास हैं, जो सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करते हैं।

सार्वजनिक चर्चा में जिस चिंता को बार-बार उठाया जा रहा है, वह यह है कि चरमपंथी हिंसा अकेले काम नहीं कर रही होती, बल्कि इसे राजनीतिक संकेतों, पावर नेटवर्कों या राज्य स्तर पर रणनीतिक अस्पष्टता से बढ़ावा मिल सकता है। राजनीतिक और आर्थिक समृद्ध लोगों से जुड़े आरोपों को लेकर भी विवाद सामने आये हैं। सार्वजनिक बहसों में मुहम्मद यूनुस का भी जिक्र है।

विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे दावों के लिए पारदर्शी जांच और सही प्रक्रिया की जरूरत है। हालांकि, वे चेतावनी देते हैं कि कोई भी राजनीतिक रणनीति जो चरमपंथी ताकतों को बर्दाश्त करती है या उनका इस्तेमाल करती है, वह राज्य की स्थिरता के लिए खतरा बन सकती है। बाहरी प्रभाव को लेकर चिंता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

आलोचकों का तर्क है कि 'स्थिरता' या प्रक्रियात्मक लोकतंत्र के इर्द-गिर्द सीमित अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव कभी-कभी चरमपंथी तत्वों को मजबूत करने वाली बातों की अनदेखी कर सकता है। इससे यह चिंता बढ़ी है कि बंगलादेश अपनी सांस्कृतिक बुनियाद के दुश्मन वैचारिक ताकतों की ओर से संचालित एक प्रॉक्सी राज्य बनने की ओर बढ़ सकता है।

छायानत के आसपास की बहस बंगलादेश के सामने बड़े सवाल रखती है, क्या उसकी राष्ट्रीय पहचान भाषाई, सांस्कृतिक और बहुलवादी परंपराओं में निहित रहेगी या बहिष्कारवादी विचारधारा के माध्यम से इसे फिर से परिभाषित किया जायेगा।

सांस्कृतिक इतिहासकार बताते हैं कि भाषा, त्योहारों, स्मारकों, अल्पसंख्यकों और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले शायद ही कभी अचानक होते हैं। वे अक्सर लंबे समय तक चलने वाली वैचारिक परियोजनाओं का हिस्सा होते हैं। दस्तावेजीकरण, हिमायत और सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिये देश और विदेश में मिलकर कदम उठाने की मांग बढ़ रही है।

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