( पूर्व राजनयिक आर के रैना से)नयी दिल्ली , दिसंबर 20 -- बंगलादेश में भीड़ की हिंसा, सत्ता का कमजोर होना और कट्टर इस्लामी समूहों का बढ़ता प्रभाव इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह पड़ोसी देश अब गंभीर आंतरिक अस्थिरता की अवस्था में प्रवेश कर रहा है।
मैमनसिंह के भालुका में फैक्ट्री मजदूर दीपु चंद्र दास की भीड़ द्वारा धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में हत्या किया जाना कानून और सार्वजनिक व्यवस्था के पतन को दर्शाती है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर उनके शव को जलाने का प्रयास और उसके बाद की अराजकता इस बात की ओर संकेत करती है कि समाज में भय ने संस्थानों पर हावी होना शुरू कर दिया है।
यह हिंसा कोई अलग घटना नहीं है। इस साल की शुरुआत में एक छात्र नेता की हत्या के बाद भी राजनीतिक माहौल गरम हो गया था। कट्टर समूहों, चरमपंथी नेटवर्क और अवसरवादी राजनीतिक तत्वों ने अनिश्चितता और प्रशासनिक जड़ता का लाभ उठाया है। पुलिस की प्रतिक्रिया इन मामलों में कमजोर रही है और ये आरोप लगते रहे हैं कि सुरक्षा बलों को हिंसक भीड़ के खिलाफ कार्रवाई न करने के निर्देश दिए गए थे। कई मामलों में, कानून लागू करने वाली एजेंसियाँ खुले हमलों के बावजूद निष्क्रिय रहीं।
संकट अब गंभीर बाहरी स्वरूप भी ले चुका है। चटगांव में भारतीय दूतावास पर हमले और ढाका, खुलना और राजशाही में भारतीय मिशनों की ओर रैली के प्रयास अंतरराष्ट्रीय नियमों को सीधे चुनौती देते हैं। ये घटनाएँ दिखाती हैं कि भारत विरोधी भावनाओं का इस्तेमाल इस क्षेत्र को अस्थिर करने और भारत के पूर्वी हिस्से को कमजोर करने की रणनीति के रूप में किया जा रहा है।
अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर हिंदू, फिर से धमकियों, हिंसा और सामाजिक दबाव का सामना कर रहे हैं। भारत विरोधी नारों और संगठित दुश्मनी से यह स्पष्ट होता है कि यह स्वाभाविक अशांति नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से संगठित आंदोलन है। कट्टर इस्लामी संगठन आत्मविश्वास हासिल कर चुके हैं, व्यापारिक गतिविधियाँ धीमी हो गई हैं और कई क्षेत्रों में औद्योगिक उत्पादन बाधित हुआ है। ये सभी संकेत गहरे संरचनात्मक संकट के हैं।
भारत की स्थिति पिछले साल की लंबी निष्क्रियता के कारण और नाजुक हो गई है। उस समय जब बंगलादेश के बड़ी आबादी को यह उम्मीद थी कि भारत स्थिरता और सुधार में मदद करेगा, तब भारत ने अधिकतर सतर्क रुख अपनाए रखा। निर्णायक हस्तक्षेप की कमी ने वह खाली स्थान पैदा किया जिसे कट्टर ताकतों ने तेजी से भर लिया।
बंगलादेश की विफलता केवल राजनीतिक दलों या नागरिक संस्थाओं के कारण नहीं है। इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सेना है। जब जनता की सुरक्षा और संवैधानिक व्यवस्था सीधे तौर पर खतरे में थी, तब बंगलादेश की सेना ने बार-बार हस्तक्षेप ना करने का विकल्प चुना। भीड़ ने शेख हसीना के आवास पर हमला करने का प्रयास किया, तब भी सेना निष्क्रिय रही। भारी हिंसा के दौरान, अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले के बावजूद सेना चुप रही। जब कट्टरपंथी तत्व धीरे-धीरे सड़कों पर नियंत्रण करने लगे या प्रशासनिक मशीनरी पर उनका प्रभाव बढ़ा, तब भी सेना ने कोई कार्रवाई नहीं की।
सेना की निष्क्रियता को नागरिक प्रशासन के प्रति सम्मान मानकर सही नहीं ठहराया जा सकता। राज्य के पतन के समय इस तरह का तटस्थ रुख अपनाना अनदेखी करने जैसा है। कार्रवाई न करके सेना ने न तो लोकतंत्र, न संवैधानिक व्यवस्था और न राष्ट्रीय एकता की रक्षा की। बल्कि, सेना बंगलादेश के लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में विफल रही।
यह मौन तब भी जारी रहा जब कट्टरता बढ़ी, सार्वजनिक संस्थाएँ कमजोर हुईं और विदेश-समर्थित चरमपंथी समूह प्रभाव में आए। इस निष्क्रियता ने पाकिस्तानी ताकतों को इस स्थिति का लाभ उठाने, देश में अस्थिरता को बढ़ावा देने और कट्टरता की राह पर धकेल देने के लिए पूरी छूट दे दी।
बंगलादेश की अस्थिरता का प्रभाव केवल इसकी सीमा तक सीमित नहीं है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की आपूर्ति श्रृंखलाओं, सीमा सुरक्षा और समुद्री मार्गों के केंद्र में स्थापित करती है। लंबी अवधि तक चलने वाली अव्यवस्था भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को प्रभावित करेगी, भारत-म्यांमार सीमा पर सुरक्षा चुनौतियों को बढ़ाएगी और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को बाधित करेगी। बंग्लादेश का जनसंख्या घनत्व और इसकी रणनीतिक स्थिति अन्य संघर्षग्रस्त समाजों की तुलना में कहीं अधिक अस्थिरता पैदा कर सकती है।
अभी तात्कालिक जिम्मेदारी बंगलादेश सेना पर है। यह सैन्य शासन की अपील नहीं है, बल्कि अस्थायी संवैधानिक जिम्मेदारी की मांग है। सेना को कानून और व्यवस्था बहाल करने, भीड़ के नियंत्रण को खत्म करने, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए उपयुक्त परिस्थितियों के निर्माण की जिम्मेदारी उठानी होगी। चुनाव आयोग भी सुरक्षित वातावरण में ही अपनी जिम्मेदारियों को निभा सकता है, जो कि अभी के हालात को देखते हुए संभव असंभव लग रहा है। कुछ समय के लिए के लिए सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ चुनाव की जिम्मेदारी सेना और उसकी मशीनरी को लेना होगा।
भारत के लिए भी बंगलादेश मामले से स्पष्ट सीख लेने की जरूरत है। रणनीतिक धैर्य को रणनीतिक उपेक्षा नहीं बनने देना चाहिए। भारत को बंगलादेश की संस्थाओं, नागरिक समाज और क्षेत्रीय साझेदारों के साथ अधिक सक्रिय रूप से जुड़ना होगा। हिंसा, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कूटनीतिक सुरक्षा पर स्पष्ट लक्ष्मण रेखाएं खिंचनी होगी और उन्हें कूटनीतिक, आर्थिक सुरक्षा साधनों से लागू करना होगा। सीमा प्रबंधन और खुफिया समन्वय को तुरंत मजबूत करना आवश्यक है।
वैश्विक हितधारकों, विशेष रूप से पश्चिमी सरकारों, को अपनी दृष्टिकोण की फिर से समीक्षा करनी होगी। राजनीतिक परिवर्तन और सुरक्षा अलग नहीं रह सकते। कानून का पालन, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और विश्वसनीय चुनाव पर आधारित शर्तों के आधार पर ही आपसी जुड़ाव को बढ़ावा देने की जरूरत है। लगातार मौन केवल कट्टर ताकतों को और अधिक उत्साहित करेगा।
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