जयपुर , अप्रैल 06 -- राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने सोमवार को कहा कि फिजियोथेरेपिस्ट भारत की प्राचीन चिकित्सा विज्ञान और पद्धति की मूल जड़ों को पहचानते हुए चिकित्सा को केवल उपचार नहीं, बल्कि सेवा और साधना का माध्यम बनाया जाना चाहिए।
श्री देवनानी जयपुर के बिरला सभागार में राजस्थान फ़िजियो समिट -2026 के उद्धाटन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। "फ़िजियोथेरेफी से फ़िजियोपैथी" विषय पर आयोजित दो दिवसीय सेमिनार में देश के 30 विश्वविद्यालयों के 2000 से अधिक संभागी भाग ले रहें है। उन्होंने कहा कि फिजियोथेरेपिस्ट अपनी विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं को अपने घरों तक ही सीमित नहीं रख आमजन एवं पीड़ित लोगों के लिए दरवाजे खोल सच्चे भाव से उनकी सेवा करें ।
उन्होंने कहा , "यदि हम अपनी जड़ों में जाएं, तो हमारे वेद, उपनिषद और पुराण स्पष्ट रूप से बताते हैं कि स्वास्थ्य केवल शरीर की स्थिति नहीं है, बल्कि यह समग्र संतुलन है। उपनिषदों में कहा गया है कि "यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे" अर्थात जो इस शरीर में है, वही इस ब्रह्मांड में है । यह केवल आध्यात्मिक वाक्य नहीं, बल्कि एक गहन वैज्ञानिक सिद्धांत है।" उन्होंने कहा , "आज फिजियोथेरेपी जिस समग्र दृष्टिकोण की बात कर रही है, वह हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले स्थापित कर दिया था। हमारे शास्त्रों में प्राण, नाड़ी, चक्र, संतुलन, ऊर्जा प्रवाह इन सभी का वर्णन मिलता है। यह वही अवधारणाएं हैं जिन्हें आज दुनिया न्यूरो रिहैबिलिटेशन, माइंड-बॉडी कनेक्शन और फंक्शनल रिकवरी के नाम से जान रही है।"उन्होंने कहा " जो ज्ञान कभी हमारे आश्रमों और गुरुकुलों में सहज था, वही आज शोध पत्रों और प्रयोगशालाओं में खोजा जा रहा है। भारत का ज्ञान कभी खोया नहीं था, वह केवल हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। आज वह समय आ चुका है जब हम उसे पुनः पहचानें, उसे आत्मसात करें और उसे विश्व के सामने एक नई दिशा के रूप में प्रस्तुत करें। आइए, हम सब मिलकर इस यात्रा को आगे बढ़ाएं। उपचार से समझ तक, समझ से चेतना तक और यह चेतना मानवता तक आगें बढ़े इसका प्रयास करें।"श्री देवनानी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत करा न केवल भारत की स्वास्थ्य परंपरा के समन्वय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया हैं बल्कि इसे वैश्विक पहचान भी दिलाई है। आज विश्व के सभी देश चाहें वे किसी भी धर्म के अनुयायी हों अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को अपना रहें है। यह केवल एक सांस्कृतिक पहल नहीं, बल्कि यह उस समग्र स्वास्थ्य दृष्टि को विश्व के सामने स्थापित करना था, जो भारत की आत्मा में निहित है।
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