दंतेवाड़ा , मार्च 13 -- छत्तीसगढ के दंतेवाडा जिले में प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल खेती को लेकर बढ़ती चर्चा के बीच गीदम विकासखंड के ग्राम बिंजाम के किसान शंकु राम ने अपनी खेती से एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने जैविक और प्राकृतिक खेती को अपनाकर खेती को कम लागत वाली और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है।

जिला जन संपर्क अधिकारी (पीआरओ) से शुक्रवार को मिली जानकारी के अनुसार, करीब तीन एकड़ जमीन पर खेती करने वाले शंकु राम कई वर्षों से रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं कर रहे हैं। वह खेत की जरूरत के अनुसार जैविक खाद और कीटनाशक स्वयं तैयार करते हैं। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए वे जीवामृत और घन-जीवामृत का उपयोग करते हैं, जबकि कीट नियंत्रण के लिए स्थानीय पौधों और जड़ी-बूटियों से बने जैविक घोल का इस्तेमाल करते हैं। इससे न केवल खेती की लागत कम हुई है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर बनी हुई है।

उनके खेत में अब बहु-फसली खेती का सफल मॉडल विकसित हो चुका है। यहां टमाटर, बैंगन और बरबटी जैसी सब्जियों के साथ-साथ क्षेत्र में प्रसिद्ध सुगंधित धान की खेती भी की जा रही है। रसायन मुक्त उत्पादन होने के कारण इन फसलों की गुणवत्ता बेहतर मानी जाती है और स्थानीय बाजार में इसकी मांग भी बनी रहती है, जिससे उन्हें अच्छी आय प्राप्त हो रही है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि देश के कई हिस्सों में किसान अब कम लागत और पर्यावरण के अनुकूल खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। दंतेवाड़ा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी प्राकृतिक खेती के ऐसे प्रयोग सामने आ रहे हैं, जहां किसान स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर खेती को मजबूत और लाभकारी बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

जिला प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा भी किसानों को प्राकृतिक खेती और कम लागत वाली तकनीकों के बारे में लगातार जानकारी दी जा रही है। अधिकारियों के अनुसार इससे छोटे और सीमांत किसानों को खेती में जोखिम कम करने और आय के नए अवसर तलाशने में मदद मिल रही है।

शंकु राम की पहल अब आसपास के गांवों में भी चर्चा का विषय बन गई है। कई किसान उनके खेत का दौरा कर जैविक खेती की तकनीकों को समझने और अपने खेतों में अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। दंतेवाड़ा के इस किसान की कहानी यह दर्शाती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद खेती को किफायती और लाभकारी बनाया जा सकता है।

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