गांधीनगर , दिसंबर 30 -- गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत की अध्यक्षता में राज्य में प्राकृतिक कृषि के संदर्भ में की जा रही गतिविधियों की समीक्षा के लिए गांधीनगर स्थित लोकभवन में राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक मंगलवार को आयोजित की गयी।

श्री देवव्रत ने बैठक में कहा कि आज भी लोगों में यह मानसिकता व्यापक रूप से व्याप्त है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उत्पादन घटेगा और देश की खाद्य सुरक्षा के समक्ष संकट उत्पन्न होगा, लेकिन यह धारणा भ्रामक है। प्राकृतिक खेती में उत्पादन घटता है, इस भ्रम को तोड़ना आवश्यक है। प्राकृतिक खेती और जैविक (ऑर्गेनिक) खेती एक नहीं हैं, दोनों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है।

राज्यपाल ने समझाया कि जैविक खेती में खर्च और परिश्रम अधिक करना पड़ता है, जबकि प्राकृतिक कृषि में न्यूनतम खर्च पर स्वस्थ उत्पादन प्राप्त होता है। जैविक खेती में प्रारंभिक दो-तीन वर्षों में उत्पादन कम मिलता है, जिसके कारण कुछ लोग प्राकृतिक खेती को भी उसी पैमाने से आंक रहे हैं, लेकिन अब यह शंका दूर होनी चाहिए।

गुजरात के चार कृषि विश्वविद्यालयों दांतीवाड़ा, जूनागढ़, आणंद और नवसारी ने तीन वर्षों तक प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और रासायनिक खेती, तीनों मॉडलों पर तुलनात्मक अध्ययन किया है। तीन वर्षों के गहन शोध के पश्चात चारों विश्वविद्यालयों ने स्पष्ट निष्कर्ष दिया है कि प्राकृतिक खेती में उत्पादन घटता नहीं है।

श्री देवव्रत ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि गुजरात के अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक कृषि अपनायें, इसके लिए सरकार की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए। उन्होंने अपने ग्रामीण दौरों के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह स्वयं प्राकृतिक कृषि के प्रचार के लिए तहसील स्तर पर जाकर किसानों के बीच रहते हैं और गुजरात के अनेक किसान प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए तैयार हैं।

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