लखनऊ , फरवरी 02 -- वर्ष 2019 में वैश्विक गरीबी को कम करने के लिए प्रयोगात्मक और नवोन्मेषी दृष्टिकोण के लिए अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रो. अभिजीत बनर्जी ने कहा कि गरीबी और भूख जैसी जटिल समस्याओं का समाधान बड़े दावों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर किए गए प्रयोगों और सूक्ष्म नीतिगत सुधारों से निकलता है। उन्होंने जोर दिया कि आज नीति-निर्माण को "अनुमानों" की जगह ठोस साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।

सोमवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में महिंद्रा सनतकदा लखनऊ महोत्सव के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रो. अभिजीत बनर्जी ने व्याख्यान दिया। उनका व्याख्यान उनकी पूर्व प्रकाशित पुस्तक "पूअर इकोनोमिक्स: ए रेडिकल रीथिक्किंग ऑफ़ दी वे टू फाईट ग्लोबल पावर्टी" के द्वितीय संस्करण पर केंद्रित था।

अपने व्याख्यान में प्रो.अभिजीत बनर्जी ने गरीबी को प्रभावित करने वाले पाँच प्रमुख स्तंभों पोषण, सूक्ष्म ऋण, शिक्षा, गरीबी जाल और छोटे प्रयासों की शक्ति पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि 147 देशों में किए गए फील्ड एक्सपेरिमेंट्स से यह धारणा सही नहीं पाई गई कि आय बढ़ते ही पोषण स्तर अपने आप सुधर जाता है। उनके अनुसार, आय बढ़ाने से ज्यादा प्रभावी लोगों की प्राथमिकताओं और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाना होता है।

शिक्षा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अत्यधिक महत्वाकांक्षी पाठ्यक्रम और कठोर शिक्षण पद्धतियाँ वास्तविक सीख को बाधित करती हैं। प्राथमिक स्तर पर "सही स्तर पर शिक्षण " जैसे प्रयोगों का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों की मौजूदा क्षमता के अनुरूप पढ़ाई कराई जाए तो पठन और गणित जैसे बुनियादी कौशल तेजी से विकसित होते हैं। उन्होंने पाठ्यक्रमों के इस "अत्याचार" को शिथिल करने की जरूरत बताई।

सूक्ष्म वित्त पर बात करते हुए प्रो.अभिजीत बनर्जी ने स्पष्ट किया कि माइक्रोफाइनेंस कोई चमत्कारिक समाधान नहीं है। भले ही इससे कुछ लोगों को कारोबार बढ़ाने में मदद मिलती है, लेकिन यह गरीबी से स्थायी मुक्ति का रास्ता नहीं बन पाता। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ऋण की कमी अक्सर परिवारों को गरीबी के दुष्चक्र में फंसा देती है। ऐसे में उत्पादक परिसंपत्तियों को तकनीकी प्रशिक्षण के साथ जोड़ने वाले कार्यक्रम जैसे बीआरएसी (बांग्लादेश रूरल एडवांसमेंट कमेटी) द्वारा अपनाया गया मॉडल अत्यंत गरीब परिवारों को आत्म-रोज़गार की ओर ले जाने में कारगर साबित हुए हैं।

नीति विफलताओं को उन्होंने तीन 'आई'-अंतर्ज्ञान, विचारधारा और जड़ता से जोड़ा और कहा कि केवल सुशासन या व्यापार नीति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि आज जरूरत "प्लम्बिंग" यानी नीतियों के क्रियान्वयन की बारीक प्रक्रियाओं पर ध्यान देने की है। प्रश्नोत्तर सत्र में उन्होंने यह भी कहा कि व्यापक ढांचों के बजाय स्थानीय स्तर पर फोकस करने से बेहतर नतीजे मिलते हैं, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इस मौके पर आलोक रंजन, पूर्व मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार, मनोज कुमार सिंह, पूर्व मुख्य सचिव, प्रदीप भटनागर, पूर्व कृषि उत्पादन आयुक्त, लीना जौहरी, अपर मुख्य सचिव, अमित घोष, अपर मुख्य सचिव, अवनीश कुमार अवस्थी मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश के सलाहकार, रोहित नंदन, पूर्व मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश तथा जी.बी. पटनायक, पूर्व कुलपति, लखनऊ विश्वविद्यालय प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित