विद्या शंकर रायलखनऊ , अप्रैल 30 -- उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले अब सियासी गोटियां बिछनी शुरू हो गई हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) की नजर पूर्वांचल में राजभर वोट बैंक पर टिकी हुई है। इसीलिए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी।

समाजवादी पार्टी (सपा) ने महिला सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर सीमा राजभर की नियुक्ति की है। इसके बाद अब उनको ग़ाज़ीपुर जाने वाले समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि मंडल में भी शामिल किया गया है।

राजभर वोट बैंक पर सपा की नज़र का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है की ओम प्रकाश राजभर को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में अखिलेश यादव ने सिर्फ़ इतना कहा कि ओम प्रकाश के बयान का जवाब सीमा राजभर ही देंगी।

सीमा राजभर को संगठन में अहमियत देने का अखिलेश यादव का कदम सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सामाजिक समीकरण साधने की एक बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब ओम प्रकाश राजभर एक बार फिर एनडीए के साथ खड़े हैं और पूर्वांचल में राजभर समुदाय पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। ऐसे में सपा के सामने इस वोट बैंक में अपनी मौजूदगी बनाए रखने की चुनौती थी।

सीमा राजभर की ताजपोशी को इसी रणनीति के तहत देखा जा रहा है, जिससे पार्टी उस खाली जगह को भरना चाहती है जो ओपी राजभर के एनडीए में जाने के बाद बनी।

बलिया की रहने वाली सीमा राजभर ने अपनी राजनीतिक शुरुआत सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से की थी और वे कभी ओपी राजभर के करीबी मानी जाती थीं। 2022 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी और बाद में सपा में शामिल हो गईं।

पार्टी छोड़ते समय उन्होंने ओपी राजभर पर कई आरोप भी लगाए थे। अब सपा उन्हें उसी सामाजिक आधार पर सामने ला रही है, जहां ओपी राजभर का वर्षों से प्रभाव रहा है।

सामाजिक न्याय समिति (2001) के अनुसार, उत्तर प्रदेश में राजभर समुदाय की आबादी करीब 2.44 प्रतिशत है, लेकिन इसका असर प्रदेश की करीब 153 विधानसभा सीटों पर माना जाता है। खासकर पूर्वांचल के गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, वाराणसी, जौनपुर, गोरखपुर, बस्ती और अंबेडकरनगर जैसे जिलों में यह प्रभाव निर्णायक हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव की PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति अब यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर व्यापक पिछड़े वर्ग को जोड़ने की कोशिश कर रही है। सीमा राजभर की नियुक्ति इसी विस्तार का हिस्सा मानी जा रही है।

ओम प्रकाश राजभर का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2017 में बीजेपी के साथ सरकार में शामिल हुए, 2019 में अलग हुए, 2022 में सपा के साथ आए और फिर 2023 में दोबारा एनडीए में लौट गए। गठबंधनों में इस बदलाव का असर उनकी पकड़ पर पड़ा है, लेकिन वे अब भी राजभर समाज के प्रमुख नेता माने जाते हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को इस समाज का समर्थन दिलाने में अन्य नेताओं की भी अहम भूमिका रही थी। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर, विधायक कमलाकांत राजभर और वरिष्ठ नेता राम अचल राजभर जैसे चेहरों ने सपा के पक्ष में माहौल बनाने में योगदान दिया था।

सपा ने इस फैसले के जरिए एक और संदेश देने की कोशिश की है। पार्टी ने जूही सिंह जैसे स्थापित चेहरे को हटाकर अपेक्षाकृत कम चर्चित नेता को आगे किया है। इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के नए संतुलन के तौर पर देखा जा रहा है, जहां पिछड़े वर्ग और खासकर महिलाओं को नेतृत्व में अधिक स्थान दिया जा रहा है।

इससे पहले भी पार्टी रुक्मिणी देवी निषाद जैसे चेहरों को आगे ला चुकी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सपा अब हाशिए पर रहे समुदायों को नेतृत्व में जगह देने की रणनीति पर काम कर रही है।

हालांकि, यह राजनीतिक दांव कितना असरदार होगा, यह अभी साफ नहीं है। राजनीति में सिर्फ चेहरे बदलने से काम नहीं चलता, बल्कि संगठनात्मक मजबूती, जमीनी पकड़ और सामाजिक स्वीकार्यता भी उतनी ही जरूरी होती है।

सीमा राजभर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे न सिर्फ अपने समुदाय में मजबूत पहचान बना सकें, बल्कि ओम प्रकाश राजभर के प्रभाव को वास्तविक चुनौती भी दे सकें। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा का यह नया दांव पूर्वांचल की राजनीति में कितना असर डालता है।

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि अखिलेश यादव को चुनाव के समय ही राजभरों की याद क्यों आई है।

सीमा राजभर को राष्ट्रीय पदाधिकारी बनाया और फिर उन्हें गाजीपुर जाने वाले डेलीगेशन में शामिल किया गया, इन सब बातों से राजभर समाज उनके साथ जुड़ने वाला नहीं है।

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