, Feb. 4 -- पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उच्चतम न्यायालय में राजनीतिक रूप से निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए पूछा, "चार राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। 24 साल बाद क्यों? तीन महीने में सब कुछ खत्म करने की इतनी जल्दी क्यों? सिर्फ बंगाल ही क्यों? असम क्यों नहीं?"उन्होंने अदालत को आगे बताया कि यह प्रक्रिया फसल कटाई के मौसम और पलायन के चरम समय के दौरान शुरू की गयी थी। उन्होंने दावा किया कि काम के भारी दबाव के कारण 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और कई बूथ स्तर के अधिकारी (बीएलओ) अस्पताल में भर्ती हुए हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने उठायी गयी चिंताओं को स्वीकार किया, विशेष रूप से स्थानीय बोलियों, बांग्ला से अंग्रेजी में लिप्यांतरण और यहां तक कि विसंगतियां पैदा करने में एआई-सहायता प्राप्त प्रक्रियाओं की भूमिका से संबंधित मुद्दों पर भी ध्यान दिया गया।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "इस तरह के मुद्दों की वजह से असली मतदाताओं को बाहर नहीं किया जाना चाहिए और असली मतदाताओं के नाम तथा उनकी स्थिति बरकरार रखने के लिये इस मामले का वास्तविक समाधान तलाशेगी।

पीठ ने अनुवाद की मुश्किलों पर भी ध्यान दिया और सुझाव दिया कि राज्य सरकार बांग्ला और स्थानीय बोलियों में माहिर टीमें देकर मदद कर सकती है, ताकि चुनाव आयोग गलतियों को पहचानने और ठीक करने में मदद कर सके।

इस मामले में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने न्यायालय के सामने विस्तृत आंकड़े पेश किये। इसमें कहा गया है कि करीब 1.36 करोड़ मतदाता यानी कुल मतदाताओं का करीब 20 प्रतिशत, तार्किक विसंगति (एलडी) श्रेणी में रखा गया है और लगभग 32 लाख मतदाताओं को "अनमैप्ड" के तौर पर वर्गीकृत किया गया है।

श्री दीवान ने तर्क दिया कि इनमें से ज्यादातर मामलों में 'दत्ता', 'गांगुली' या 'रॉय' आदि की वर्तनियों में अंतर भर था। ऐसा पुरानी बंगाली मतदाता सूची के अंग्रेजी में अनुवाद की वजह से हुआ था। उन्होंने कहा कि मतदाताओं को जारी की गयी याचिका में बिना कारण बताये सिर्फ 'मैपिंग में अंतर' बताया गया। इससे मतदाताओं को जवाब देने का सही मौका नहीं मिला।

श्री दीवान ने दलील दी, "न्यायालय के आदेशों के बावजूद, फैमिली रजिस्टर, आधार कार्ड या जाति प्रमाण पत्र में से किसी को भी स्वतः प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है।" उन्होंने यह मांग की कि केवल नाम की विसंगतियों के आधार पर जारी की गयी याचिका वापस ली जाए और प्रत्येक 'तार्किक विसंगति' (एलडी) वर्गीकरण के कारणों का खुलासा करना अनिवार्य किया जाए।

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डी एस नायडू ने कहा कि उन्हें अभी तक याचिकाओं की प्रतियां प्राप्त नहीं हुई हैं और उन्होंने निर्देश प्राप्त करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा। मुख्य न्यायाधीश ने इसे दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया और टिप्पणी की कि चुनावी प्रक्रिया बहुत ही सख्त समय-सीमा के तहत चल रही है।

पीठ ने कहा, "हमने पहले ही दस दिन का समय बढ़ा दिया है। सुनवाई के लिए सिर्फ चार दिन बचे हैं। हम एक हफ्ते की छूट नहीं दे सकते।"एक विशेष व्यक्तिगत हस्तक्षेप में सुश्री बनर्जी ने न्यायालय से कहा, "मैं यहां अपनी पार्टी के लिए नहीं आयी हूं। मैंने चुनाव आयोग को पत्र लिखे। जब न्याय बंद दरवाजों के पीछे कराह रहा हो और हमें कहीं भी न्याय न मिल रहा हो, तब हम यहां आये हैं।"पीठ ने संज्ञान लिया कि पश्चिम बंगाल राज्य ने भी स्वतंत्र रूप से एक याचिका दायर की थी और कपिल सिब्बल सहित वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इससे पहले प्रक्रियात्मक कठिनाइयों और वास्तविक निवासियों को बाहर किये जाने की आशंकाओं के बारे में बताया था।

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