अमृतसर , जनवरी 19 -- पंजाब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता प्रोफेसर सरचंद सिंह ख्याला ने श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़ग़ज्ज़ द्वारा ब्रिटेन के मनवीर सिंह मन्ना पर लगाये गये प्रतिबंध के संबंध में श्री अकाल तख्त साहिब के पांच सिंह साहिबों द्वारा जारी आदेश को मनमाने ढंग से हटाये जाने को पंथिक संस्थाओं की सर्वोच्चता पर सीधा हमला बताया।
प्रो. ख्याला ने सोमवार को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अध्यक्ष से अकाल तख्त साहिब की गरिमा की रक्षा के लिए तत्काल हस्तक्षेप करने, ज्ञानी गड़ग़ज्ज़ से उनके सिद्धांतहीन कार्यों के संबंध में जवाब मांगने और उन्हें पद से हटाकर स्थायी जत्थेदार के रूप में सैद्धांतिक रूप से परिपक्व गुरसिख को नियुक्त करने की अपील की। उन्होंने कहा कि श्री अकाल तख्त साहिब के पांच सिंह साहिबों द्वारा छह दिसंबर, 2022 को जारी स्पष्ट आदेश के अनुसार, यूके की तथाकथित सत्कार समिति के प्रमुख मनवीर सिंह मन्ना को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रति सम्मान के नाम पर अशोभनीय कृत्य करने और संगत को गुमराह करने का दोषी पाया गया था और संगत को आदेश जारी किये गये थे कि वे किसी भी तरह से उनके साथ सहयोग न करें। उन्होंने कहा कि आश्चर्यजनक रूप से, अब ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़ग़ज्ज़ ने पांच सिंह साहिबों की बैठक बुलाए बिना, आरोपी को तख्त साहिब में बुलाए बिना और किसी भी पंथिक अनुमोदन के बिना, ब्रिटेन की अदालत में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की कथित चोरी के मामले में मनवीर सिंह के पक्ष में सभी सिख संगतों और गुरुद्वारा समितियों को 'पूर्ण सहयोग' प्रदान करने के आदेश जारी कर दिये हैं, जो पंथिक परंपराओं का स्पष्ट उल्लंघन है।
प्रो. ख्याला ने यह सवाल उठाया कि क्या एक अकेला जत्थेदार पांच सिंह साहिबों द्वारा जारी किए गए एक महत्वपूर्ण पंथिक फैसले को अपनी मर्जी से बदल सकता है? क्या यह पांच शीर्षों वाली संस्था और श्री अकाल तख्त साहिब की सर्वोच्चता का सीधा अपमान नहीं है? यदि 2022 की जांच 'पक्षपातपूर्ण' थी, तो अब तक जांच करने वाली उप-समिति के खिलाफ क्या कार्रवाई की गयी है? क्या आरोपी को तख्त साहिब में बुलाये बिना उसके पक्ष में फैसले लेना अकाल तख्त साहिब की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचाने के बराबर नहीं है? उन्होंने यह भी कहा कि ज्ञानी गड़ग़ज्ज़ द्वारा मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को तलब करते समय अकाल तख्त सचिवालय को अलग बताने का तर्क आज सचिवालय द्वारा जारी आदेशों की वैधता पर और भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
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