नयी दिल्ली , मार्च 9 -- बजट सत्र के उत्तरार्ध के पहले दिन सोमवार को राज्य सभा में 2026-27 के बजट के संदर्भ में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के कामकाज पर चर्चा की शुरुआत पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के साथ हुई जिसमें सदस्यों ने 'बगैर पर्यावरण नुकसान के विकास' पर बल दिया और जल, वायु एवं जैव विविधता संरक्षण संबंधी नियम और कानूनों को राज्यों तथा नगरपालिका तक के स्तर पर कारगर तरीके से लागू कराने के कारगर उपाय किये जाने पर जोर दिया।
चर्चा में मंत्रालय के काम-काज के समुचित पुनर्गठन, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ( सीपीसीबी ) में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने, रणनीतियों की समीक्षा किये जाने तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अलग प्राधिकरण बनाये जाने का सुझाव दिया गया। चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष के सदस्यों ने संरक्षित आद्र क्षेत्रों (रामसर) के प्रसार, वनाच्छादन में प्रगति, देश भर में प्रदूषण निगरानी केंद्रों के नेटवर्क , कचरा प्रबंधन , ई-वाहन पेट्रोल में एथनाल मिश्रण जैसी मोदी सरकार की विभिन्न पहलों के चलते पर्यावरण संरक्षण में सुधार का उल्लेख किया।
चर्चा में भाग लेते हुए वाइएसआर कांग्रेस पार्टी के अयोध्या रामीरेड्डी ने भारत के लिए जल सुरक्षा और हरित अर्थव्यवस्था के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि देश में विश्व की 17-18 प्रतिशत आबादी रहती है जबकि वैश्विक जल स्रोत का केवल 4 प्रतिशत ही हमारे पास है। उन्होंने जल प्रदूषण की पर नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 'जल सुरक्षा पर ध्यान न दिया तो यह विकसित भारत के लिए जल संकट की स्थिति उत्पन्न कर देगा।'श्री रेड्डी ने इस बार के बजट में मंत्रालय के लिए 4413 करोड़ रुपये से कुछ ही अधिक बजट के प्रावधान को चुनौतियों के समक्ष नगण्य बताया। उन्होंने कहा कि यह कुल बजट के करीब 0.1 प्रतिशत के बराबर है जिसे 5 प्रतिशत तक करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि 'भुगतान-प्रदूषणकर्ता करे' के सिद्धांत पर काम करते हुए संसाधान जुटाए जा सकते हैं।
उन्होंने इस उन्होंने हरित अर्थव्यवस्था पर ध्यान देने, पर्यावरण संरक्षा के क्षेत्र में बुनियादी कमियों को दूर करने तथा अगले 25 साल के लिए रणनीति तैयार किये जाने पर बल दिया1श्री रेड्डी ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) में केवल 500 स्थायी कर्मी हैं जबकि जरूरत इसके दस या तीस गुने स्टॉफ की है। उन्होंने कहा कि 2014 में इस मंत्रालय का पुनर्गठन किया गया था और इसके नाम में जलवायु परिवर्तन भी शामिल कर दिया गया संबंधित क्षेत्रों के लिए समर्पित पुनर्गठन का काम नहीं हुआ है।
मंत्रालय के कामकाज और रणनीति की 12 माह के अंदर स्वतंत्र समीक्षा कराये जाने, पुनर्चक्रण आधारित अर्थव्यवथा के लिए एक प्राधिकरण बनाने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय समन्वय समिति बनाने का भी सुझाव दिया गया जिसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हों।
उन्होंने कहा, 'हम पर्यावरण संरक्षा और जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में तेजी से आगे नहीं बढ़े तो हमें बड़ा नुकसान हो सकता है। हमारी अंतराष्ट्रीय रैंकिंग गिरेगी... निवेश प्रभावित होगा।"विपक्षी सदस्यों की अनुपस्थिति के बीच चर्चा शुरू करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि भारतीय समाज सदैव से प्रकृति प्रेमी रहा है लेकिन औद्योगीकरण, मोटरवाहन का चलन और चारो तरफ फैलता कचरा मानवता के लिए संकट हो गया है।
उन्होंंने पिछले एक दशक में मोदी सरकार की पहलों की सराहना करते हुए कहा कि इससे देश में 'रामसर' प्रमाणित आर्द्र क्षेत्रों की संख्या 26 से बढ कर 98 हो गयी है। वनाच्छादन बढ़ा है। सरकार ने देश भर में 620 शहरी वन क्षेत्रों के विकास के लिए 654 करोड़ रुपये की योजना का प्रावधान किया है। ये क्षेत्र शहरों के फेफड़े का काम करेंगे।
श्री तिवाड़ी ने प्रदूषण निगरानी केंद्र के नेटवर्क के विस्तार, एक पेड़ मां के नाम से वृक्षारोपण अभियान, कचरा पुनर्चक्रण, बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत नवीकरणी स्रोतों से हासिल करने के लक्ष्य के समय से पहले हासिल किये जाने तथा ई-मोबिलीटी, 99 रेल मार्गों के विद्युतीकरण तथा मिशन लाइफ का उल्लेख करते हुए कहा मोदी सरकार की सराहना की।
श्री तिवाड़ी ने कहा, ''प्रधानमंत्री मोदी जुलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भगीरथ प्रयत्न कर रहे है.. पर्यावरण संरक्षण का काम इसे जन-आंदोलन बना कर ही हासिल किया जा सकता है।''उन्होंने अपने संबोधन के दौरान विनोदपूर्ण तरीके से कहा कि देश में राजनीतिक प्रदूषण, और भ्रष्टाचार के कचरे से निपटने की जरूरत है और मोदी जी इस काम को जानते हैं और इसमें भी लगे हैं ।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित