जयपुर , मार्च 30 -- राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है किसी बड़े पद पर आसीन व्यक्ति के परिवार वालों को सरकार के कामकाज में दखल देने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। अगर ये राजनीति में आते हैं, तो उनका स्वागत करना चाहिए।

श्री गहलोत ने सोमवार को केरल जाने से पहले यहां मीडिया से बातचीत में यह बात कही। उन्होंने कहा, परिवार के लोगों को सरकार में दखल करने की इजाजत मत दो। आप उनको राजनीति में लाओ, वे हमारे उदाहरण दे रहे सोनिया जी एवं मेरे, आप लाओ न, उनको राजनीति में उनका स्वागत करेंगे और हमारी वर्तमान पीढ़ी जो है चाहे किसी पार्टी की है उनके परिवार के लोगों को इसके लिए मोटिवेट भी करना चाहिए।"उन्होंने कहा कि अगर कोई छात्र-युवा राजनीति में आ सकता है, नेताओं के बच्चे भी आ सकते हैं, खाली आउट ऑफ टर्न उनको मदद नहीं मिले, इतनी तो बात है या किसी का हक मत मारो, ये तो होता है, बाकी राजनीति में आने में क्या हर्ज है। अगर मान लो परिवार होगा, पारिवारिक पॉलिटिकल पृष्ठभूमि का उनके परिवार के लोग आएंगे तो उनका अनुभव जनता के काम आएगा। ऐसे में हमें बच्चों को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए।

श्री गहलोत ने कहा, "सब आएं, बेटा- बेटी कोई आओ, पर सरकार में दखल करेंगे, भ्रष्टाचार करवाएंगे, बदनामी किसकी होगी मुख्यमंत्री की होगी, मंत्रियों की होगी, हो भी रही है क्या ये खबरे नहीं पहुंचती है मुख्यमंत्री के पास।"उन्होंने कहा, "मैंने अपने बेटे को तो मुख्यमंत्री निवास में नहीं रखा पूरे परिवार को किराए का मकान लेकर वो रहे पांच साल। आप बता दीजिए कि ये उदाहरण हम लोग दे रहे हैं हम लोगों का उदाहरण दे रहे हैं चाहे वे आरसीए के चेयरमैन बने हो तो सीपी जोशी जाने वो जाने भैया मैंने तो एक सेकंड भी टाइम नहीं दिया उसके अंदर, मैं तो पड़ा भी नहीं हूं और अगर वो चुनाव लड़े हैं पार्टी ने टिकट दिया उसको, ऐसी स्थिति बनी होगी उनको टिकट मिला वहां पर उससे इन बातों का क्या संबंध जो मैं बोल रहा हूं मैं तो कह रहा हूं बेटे बेटियों का आप सरकार में दखल करने की इजाजत मत दो ये मैंने कहा है।"श्री गहलोत ने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री के रुप में खेलों को प्रोत्साहन देने का प्रयास किया लेकिन दो साल हो गए क्रिकेट स्टेडियम अधूरा पड़ा हुआ है। आरसीए के चुनाव ही नहीं हो रहे हैं और आपस में लड़ रहे हैं ये लोग। कौन लड़वा रहा। मुख्यमंत्री की नॉलेज में नहीं है क्या। कोई बोल नहीं रहा है। चुनाव नहीं करवा रहे हैं विश्वविद्यालय के, कॉलेज के। विश्वविद्यालय चुनाव क्यों नहीं करवा रहे। नई पीढ़ी को प्रोत्साहन नहीं देना चाहते हैं क्या। ये तमाम बातें जो हो रही है न वो बहुत ही बुरी हो रही है।

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