जयपुर , जनवरी 21 -- राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर ने राज्य में पंचायती राज संस्थाओं के पुनर्गठन को चुनौती देने वाली 60 से अधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक हस्तक्षेप से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित नहीं होने दी जा सकती।

जयपुर पीठ के न्यायमूर्ति इंद्रजीत सिंह और न्यायमूर्ति रवि चिरानिया की खंडपीठ ने सभी याचिकाओं का एक साथ निस्तारण करते हुए कहा कि पुनर्गठन प्रशासनिक और नीतिगत प्रक्रिया है, जिसमें अदालत का अत्यधिक दखल आवश्यक नहीं है।

खंडपीठ ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि इसी मुद्दे पर पहले भी उच्च न्यायालय निर्णय दे चुका है और उच्चतम न्यायालय ने भी 15 अप्रैल तक पंचायत चुनाव कराने की समय-सीमा तय कर दी है। ऐसे अवसर पर हस्तक्षेप करना चुनावी प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब का कारण बन सकता है, जिसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गयी थी कि परिसीमन एवं पुनर्गठन में नियमों का पालन नहीं हुआ है और कई क्षेत्रों में असमानता उत्पन्न हो रही है। उनका कहना था कि प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है, जिसके कारण स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। अदालत ने हालांकि इन तर्कों को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए कहा कि प्रशासनिक फैसलों को चुनौती देने के लिए ठोस और विश्वसनीय आधार होने चाहिए, जो इस मामले में प्रस्तुत नहीं किये गये।

खंडपीठ ने टिप्पणी की कि हर चुनाव से पहले इस प्रकार की याचिकाओं पर हस्तक्षेप किया जाये, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित होगी और समयबद्ध चुनाव कराना मुश्किल हो जाएगा।

खंडपीठ ने इसी आधार पर सभी याचिकाएं निरस्त कर दीं।

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