नैनीताल , अप्रैल 20 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कोविड महामारी के दौरान एक महिला से दुर्व्यवहार के आरोपी पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए उसे बहाल करने का आदेश दिया है।

न्यायालय ने कहा कि बिना विभागीय जांच और सुनवाई का अवसर दिए किसी भी कर्मचारी को सेवा से नहीं हटाया जा सकता।

मामले के अनुसार याचिकाकर्ता जगदीशनाथ को वर्ष 2012 में उत्तराखंड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था। ऊधमसिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) द्वारा 24 मई, 2020 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

कांस्टेबल पर आरोप था कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान पुलभट्टा (किच्छा) स्थित सूरजमल इंजीनियरिंग कॉलेज में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटर में ड्यूटी के दौरान उसने एक महिला के साथ दुर्व्यवहार किया। चिकित्सा जांच में उसके शराब के नशे में होने की पुष्टि होने का भी उल्लेख बर्खास्तगी आदेश में किया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कथित घटना और बर्खास्तगी आदेश दोनों एक ही दिन 24 मई 2020 को पारित किए गये। आगे कहा गया कि न तो कोई विभागीय जांच कराई गई और न ही उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। इसे संविधान के अनुच्छेद 311(1) और उत्तर प्रदेश पुलिस अधीनस्थ अधिकारी (दंड एवं अपील) नियम, 1991 का उल्लंघन बताया गया।

वहीं, राज्य की ओर से कहा गया कि बर्खास्तगी का निर्णय सितारगंज के सर्किल अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया था। हालांकि न्यायालय ने पाया कि उक्त अधिकारी को विधिवत जांच अधिकारी नियुक्त नहीं किया गया था और उन्होंने केवल घटना की सूचना दी थी।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि नियम 8(2)(ख) के तहत विभागीय जांच से छूट केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जा सकती है, जबकि इस मामले में ऐसा कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किया गया। न्यायालय ने इसे नियमों का मनमाना प्रयोग करार दिया।

न्यायालय ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के ''यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तुलसी राम पटेल (1985)'' मामले का हवाला देते हुए कहा कि जांच से छूट देने के लिए स्पष्ट और ठोस कारण होना आवश्यक है, केवल नियमों की भाषा दोहराना पर्याप्त नहीं है।

न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की पीठ में इस मामले 15 अप्रैल को सुनवाई हुई लेकिन आदेश की प्रति आज मिली। पीठ ने बर्खास्तगी आदेश एवं अपीलीय आदेश को निरस्त करते हुएयाचिकाकर्ता को सेवा में निरंतरता के साथ बहाल करने के निर्देश दे दिए।

यही नहीं अदालत ने बकाया वेतन का 50 प्रतिशत भुगतान करने का आदेश भी दिया। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि विभाग चाहे तो नियमानुसार पुनः विभागीय जांच शुरू कर सकता है, जिसे तीन माह के भीतर प्रारंभ करना होगा।

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