(जयंत रॉय चौधरी से)नयी दिल्ली , जनवरी 23 -- महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फाफ एक ऐसी किताब लिख रही हैं जिसका उद्देश्य नेताजी की पत्नी एमिली शेंकल के जीवन पर प्रकाश डालना है जिनके बारे में अभी तक लोगों को बहुत कम जानकारी है।
'सुभाष'ज़ एमिली'(सुभाष की एमिली) शीर्षक (अभी अंतिम निर्धारण बाकी) से लिखी जा रही इस किताब में सुश्री फाफ अपने पिता सुभाष चंद्र बोस के बजाय अपनी मां एमिली शेंकल पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। गौरतलब है कि नेताजी के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है लेकिन उतना ही कम जिक्र उनकी पत्नी का हुआ है। एमिली ऑस्ट्रियाई मूल की महिला थी, जिनका जीवन प्रेम, युद्ध, मुश्किल समय और एक लंबे सन्नाटे के बीच अपनी तरह से बीता।
सुश्री फाफ ने यूनीवार्ता से फोन पर हुई बातचीत में कहा, "मेरी मां का जन्म प्रथम विश्व युद्ध से पहले हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह एक युवती थीं और उन्होंने युद्ध के बाद के यूरोप में बहुत कठिन जीवन व्यतीत किया, लेकिन वे हमेशा शक्ति का स्तंभ बनी रहीं।"विएना की रहने वाली एमिली शेंकल ने नेताजी के सचिव के रूप में काम किया था। उन्होंने बाद में उनसे शादी की और उनकी एक बेटी (अनीता) हुई। इसके तुरंत बाद भीषण विश्व युद्ध के बीच सुभाष चंद्र बोस भारत की आजादी के संघर्ष को अंजाम तक ले जाने के जर्मनी से दक्षिण-पूर्वी एशिया के लिए रवाना हो गए थे।
जहाँ नेताजी ने आजाद भारत के लिए एक अस्थायी सरकार बनायी और आजाद हिंद फौज (आईएनए) का युद्ध में नेतृत्व किया, वहीं एमिली यूरोप में ही रहीं। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की उथल-पुथल और उसके बाद के कठिन दौर को अकेले ही झेला और अभाव, तथा राजनीतिक अनिश्चितता के बीच अपनी बेटी अनीता का पालन-पोषण किया।
यह पुस्तक द्वितीय विश्व युद्ध से पहले के एमिली के जीवन, युद्ध के दौरान उनकी युवावस्था और उसके बाद के कठिन वर्षों का विवरण देगी। सुश्री फाफ ने कहा, "हम बोस परिवार के सदस्यों से केवल 1947 में ही मिल सके थे, जब नेताजी के भाई शरत चंद्र वियना गये थे।"एक ऑस्ट्रियाई कैथोलिक परिवार में 1910 में जन्मी एमिली से सुभाष चन्द्र बोस 1934 में मिले थे और उन्हें अपना सचिव नियुक्त किया था। तब वह यूरोप में निर्वासन में रहते हुए अपनी किताब 'द इंडियन स्ट्रगल' लिख रहे थे। दोनों ने 1937 में तब शादी की जब सुभाष चंद्र बोस एक बार फिर यूरोप की यात्रा पर थे। लेकिन वे साथ में तब रहे जब नेताजी भारत में 1940 की नजरबंदी से फरार होकर अफगानिस्तान व रूस के रास्ते जर्मनी पहुंच गये थे।
उनकी बेटी अनीता का जन्म नवंबर 1942 में हुआ और 1943 में नेताजी भारत की आजादी के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिये दक्षिण-पूर्वी एशिया आ गये ।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद के ऑस्ट्रिया और जर्मनी में 'धुरी शक्तियों' से जुड़े व्यक्तियों को गहरे अविश्वास से देखा जाता था। सबसे वांछित ब्रिटिश विरोधी नेताओं में से एक नेताजी से जुड़ी होने के कारण एमिली उसी साये में रहीं।
अनीता बोस फाफ बताती हैं कि उनकी मां और भारत में बोस परिवार के बीच संपर्क बेहद धीमा और अनिश्चित था क्योंकि युद्ध के बाद यूरोप खराब बुनियादी ढांचे और कमजोर संपर्क सेवाओं से जूझ रहा था और 1946 में एक दूसरे को भेजे गए पत्र या तो खो गये, देरी से पहुंचे या कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सके।
सुश्री फाफ पहली बार अपनी मां के साथ 1960 में भारत आई थीं। तिरासी वर्षीय अनीता बोस फाफ कहती हैं कि उस यात्रा की कुछ धुंधली यादें आज भी उनके पास हैं, हालांकि उस समय वह बहुत छोटी थीं। वह स्वीकार करती हैं, "कुछ यादें कम हैं, लेकिन दस्तावेज और कहानियां मौजूद हैं। मुझे विश्वास है कि किताब पूरी की जा सकती है।"वह अकेले काम नहीं कर रही हैं। उनकी बेटी माया, जो अपनी नानी को व्यक्तिगत रूप से जानती थीं, इस कहानी को आकार देने में मदद कर रही हैं। नेताजी के बडे़ भाई शरत चंद्र बोस की पोती माधुरी बोस भी इस प्रयास में योगदान दे रही हैं।
अनीता बोस फाफ इस किताब के उद्देश्य को लेकर स्पष्ट हैं। उन्होंने कहा, "यह सुभाष चन्द्र बोस पर एक और किताब नहीं है। वह कहानी कई बार सुनायी जा चुकी है लेकिन मेरी मां की कहानी कभी नहीं सुनायी गयी।"इस किताब का उद्देश्य उस खामोशी को भरना है। यह उस महिला का एक व्यक्तिगत विवरण पेश करेगी जो विश्व इतिहास के हाशिए पर खड़ी थी, लेकिन जिसने इसके सबसे भयंकर तूफानों को झेला। यह उस महिला के बारे में है जो भारत की सबसे प्रतिष्ठित हस्तियों में से एक से जुड़ी थी, लेकिन अपना जीवन अकेले अपने दम पर जीने के लिए मजबूर थीं।
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