भदोही , फरवरी 1 -- कभी नील की खेती के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण का साक्षी रहा उत्तर प्रदेश का भदोही जिला आज हस्तनिर्मित कालीनों के लिए विश्व पटल पर अपनी पहचान बना चुका है।
गोपीगंज और आसपास का क्षेत्र 18वीं-19वीं सदी में नील उत्पादन का प्रमुख केंद्र था, जहां अंग्रेजों की ददनी प्रथा के तहत किसानों को जबरन नील की खेती के लिए बाध्य किया जाता था। इतिहासकार हरिओम शास्त्री के अनुसार गंगा किनारे की उपजाऊ भूमि नील के लिए उपयुक्त मानी जाती थी और अमवा सहित कई गांवों में नील कारखाने संचालित थे, जिनके अवशेष आज भी उस दौर की गवाही देते हैं।
बताया जाता है कि शोषण के विरुद्ध किसानों ने आवाज उठाई और नील विद्रोह की लपटें पूर्वी उत्तर प्रदेश तक पहुंचीं। 19वीं सदी के अंत में जर्मनी में कृत्रिम रंगों के विकास के बाद प्राकृतिक नील की मांग घटने लगी और धीरे-धीरे इस क्षेत्र में नील की खेती समाप्त हो गई। इसके बाद स्थानीय श्रमिकों के सामने आजीविका का संकट उत्पन्न हुआ, जिससे उबरने के लिए उन्होंने कालीन उद्योग की ओर रुख किया।
कालांतर में कालीन बुनाई, डाइंग, वाशिंग और पैकिंग जैसे कार्यों से जुड़े श्रमिकों की मेहनत ने भदोही को "कालीन नगरी" के रूप में स्थापित कर दिया। देश के हस्तनिर्मित कालीन निर्यात में भदोही की हिस्सेदारी 60 से 70 प्रतिशत तक मानी जाती है। यहां से प्रतिवर्ष लगभग 9,500 से 14,000 करोड़ रुपये के कालीन अमेरिका और यूरोपीय देशों को निर्यात किए जाते हैं। 500 से अधिक निर्यात इकाइयों और लाखों बुनकरों के परिश्रम ने भदोही को वैश्विक मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिलाई है।
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