नयी दिल्ली , मार्च 14 -- केंद्र ने कंपनियों के कैप्टिव विद्युत उत्पादन संयंत्रों (सीजीपी) से जुड़े नियमों की व्याख्या को अधिक स्पष्ट करने और इसे व्यवसाय के लिए अधिक आसान एवं अनुकूल बनाने के लिए विद्युत नियमावली , 2005 के नियम 3 में संशोधन किये हैं।
विद्युत मंत्रालय की शनिवार को जारी विज्ञप्ति के अनुसार इस संबंध में विद्युत (संशोधित) नियमावली-2026 को अधिसूचित कर दिया गया है। मंत्रायल ने कहा कि 0इन संशोधनों का उद्देश्य नियमों की व्याख्या से जुड़ी अस्पष्टताओं को दूर करना, उद्योगों के लिए कारोबार में आसानी को सुधानाऔर कैप्टिव बिजली संयंत्र व्यवस्था को भारत के ऊर्जा संक्रमण और औद्योगिक विकास के लक्ष्यों के साथ समन्वित करना है।
नये संशोधनों के कुछ प्रावधान कुछ प्रावधान 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे जबकि अन्य संशोधन तुरंत प्रभाव से लागू होंगे।
अधिनियम, 2003 में कैप्टिव बिजली उत्पादन को एक महत्वपूर्ण प्रावधान के रूप रखा गयाहै और इसे राष्ट्रीय विद्युत नीति , 2005 किफायती बिजली उपलब्ध कराने के महत्वपूर्ण साधन के रूप में मान्यता दी गयी है।
मंत्रालय का कहना है कि इन संशोधनों के जरिए कैप्टिव पावर प्रावधानों के क्रियान्वयन में और स्पष्टता लायी गयी है जबकि स्वामित्व और उपभोग से जुड़े कानूनी सुरक्षा प्रावधान बनाए रखे जाएंगे। इससे उद्योगों को अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पादन करना अधिक आसान बनाने के लिए कानूनी व्यवस्थाएं अधिक स्पष्ट और लचीली हुई हैं।
कैप्टिव बिजली संयंत्रों के स्वामित्व की परिभाषा में अब अनुषंगी कंपनियां और होल्डिंग कंपनियां तथा होल्डिंग कंपनी की अन्य सहायक कंपनियां भी शामिल की गयी हैं। मंत्रालय का कहना है कि आधुनिक कॉर्पोरेट संरचनाओं को ध्यान में रखते हुए यह संशोधन किया गया है। नयी कार्पोट संरचनाओं में बिजली परियोजनाएं अक्सर समूह की किसी इकाई या विशेष प्रयोजन कंपनी (एपीवी) के माध्यम से विकसित की जाती हैं।
नये नियमों के तहत अब कैप्टिव स्थिति का सत्यापन पूरे वित्तीय वर्ष के लिए किया जाएगा। पहले या अंतिम वर्ष में, सत्यापन केवल संबंधित अवधि के लिए किया जा सकेगा।
इन संशोधनों के तहत इकाइयों (व्यक्तियों) के किसी समूह (एओपी) द्वारा स्थापित कैप्टिव प्लांट के माध्यम से स्थापित ग्रुप कैप्टिव परियोजनाओं को संचालन में अधिक आसनी होगी। कैप्टिव उपभोक्ता अपनी जरूरत के अनुसार बिजली ले सकेंगे लेकिन इसमें स्वामित्व और उपभोग की कानूनी शर्तों का पालन आवश्यक रहेगा।
यदि कोई उपभोक्ता अपने हिस्से से अधिक बिजली लेता है तो इससे प्लांट का कैप्टिव दर्जा समाप्त नहीं होगा। ऐसे मामले में अतिरिक्त बिजली व्यक्तिगत कैप्टिव खपत नहीं मानी जाएगी और उसे कुल कैप्टिव खपत में गिना जाएगा। यदि एओपी का कोई सदस्य 26 प्रतिशत या उससे अधिक स्वामित्व रखता है, तो उसके लिए अनुपातिक खपत की शर्त लागू नहीं होगी और उसकी पूरी खपत कैप्टिव खपत मानी जाएगी।
नये नियमों के तहत राज्य और केंद्र शासित क्षेत्र की सरकारें अपनी सीमाओं के अंदर संयंत्र की बिजली की कैप्टिव खपत स्थिति की जांच के लिए नोडल एजेंसी नियुक्त कर सकेंगी। अंतर-राज्य मामलों में सत्यापन राष्ट्रीय विद्युत भार डिस्पैच केंद्र (एनएलडीसी) द्वारा किया जाएगा।
विवादों के समाधान के लिए एक समिति भी बनाई जाएगी और कैप्टिव स्थिति की जांच पूरी होने तक आड़ी सब्सिडी अधिभार और अतरिक्त अधिभार नहीं लगाए जाएंगे।
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