कोलकाता , दिसंबर 11 -- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा है कि नाबालिग के साथ सहमति से बनाया गया शारीरिक संबंध कानून के तहत माफी योग्य नहीं है।
न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की पीठ ने उक्त टिप्पणी करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।उच्च न्यायालय ने बचाव पक्ष के तर्कों को दृढ़ता से खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी के बच्चे का पिता होने को चुनौती दी गई थी। डीएनए रिपोर्ट और पीड़िता के बयान को वैज्ञानिक प्रमाण मानते हुए अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि आरोपी ही बच्चे का पिता है।
शीर्ष न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि अगर नाबालिग का गवाह विश्वसनीय है तो और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होती है। इसके अलावा न्यायालय ने पीड़िता की उम्र को चुनौती देने वाले तर्कों को जन्म प्रमाण पत्र के हवाले से अस्वीकार कर दिया और कहा कि बचाव पक्ष ने परीक्षण के दौरान इस पर पहले कभी आपत्ति नहीं जताई। प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी को भी न्यायालय ने माफ कर दिया, क्योंकि अदालत ने यह माना कि नाबालिग को पहले आरोपी के विवाह के वादे पर विश्वास था।
उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में आजीवन कारावास की सजा को तो बरकरार रखा ही, साथ में आरोपी को आदेश दिया कि अगर वह जमानत पर है तो तुरंत समर्पण करे और मुआवजे के रूप में पीड़िता को 2,00,000 रुपये का भुगतान भी करे। न्यायालय ने इसके अलावा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह 15 दिनों के भीतर 1,80,000 रुपये का भुगतान करे।
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