जयपुर, अप्रैल 10 -- राजस्थान के बाड़मेर जिले की भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे रेगिस्तानी गांव सुंदरा में आज़ादी के बाद पहली बार हर घर तक नल से स्वच्छ पेयजल पहुंचा है।

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार 728 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर सरदार सरोवर बांध से नर्मदा का पानी सुंदरा गांव तक पहुंचा। यह केवल पानी की आपूर्ति नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही कठिनाइयों पर जीत और नई उम्मीदों की शुरुआत है। सन् 1734 में स्थापित सुंदरा गांव कभी क्षेत्रफल की दृष्टि से देश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत माना जाता था। लगभग 1345 वर्ग किलोमीटर में फैले इस गांव का जीवन हमेशा से रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों से जुड़ा रहा है। बाड़मेर मुख्यालय से करीब 170 किलोमीटर दूर बसे इस गांव के लोगों को पीने के पानी के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा।

गांव का भूजल इतना खारा था कि पशु भी उसे पीने से कतराते थे। सरकार द्वारा लगाए गए ट्यूबवेल भी बेकार साबित हुए। मजबूरी में लोगों को 15-20 किलोमीटर दूर अन्य गांवों से पानी ढोकर लाना पड़ता था।

भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 और भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 के दौरान इस सीमा क्षेत्र के गांव को खाली करवा दिया गया था। ऐसे में सुंदरा के लोगों ने न सिर्फ प्राकृतिक कठिनाइयों, बल्कि ऐतिहासिक चुनौतियों का भी सामना किया।

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या-पेयजल-का समाधान बना नर्मदा नहर आधारित पेयजल परियोजना। सरदार सरोवर बांध से शुरू होकर नर्मदा का पानी 728 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर सुंदरा गांव तक पहुंचा। करीब 513 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत 200 से अधिक गांवों तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

सोलह बड़े जल संग्रहण केंद्र (सीडब्ल्यूआर) बनाए गए है। कई पम्पिंग स्टेशन स्थापित किए गए और 80 से अधिक एलिवेटेड सर्विस रिज़र्वायर तैयार किए गए। रेत के ऊंचे-ऊंचे टीलों को काटकर पाइपलाइन बिछाना, बिजली की कमी और सीमा क्षेत्र में सुरक्षा प्रतिबंध, इन सभी बाधाओं को पार करते हुए यह परियोजना पूरी की गई।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित