कौशांबी , फरवरी 28 -- आधुनिकता की दौड़ में फाल्गुन के पारंपरिक लोकगीत और होली की सामूहिक सांस्कृतिक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। अब न ढोलकी की थाप सुनाई देती है, न झांझ-मजीरे की सुमधुर ध्वनि। गांवों की चौपालें, जहां कभी देर रात तक फगुआ गीत गूंजते थे, अब सूनी नजर आती हैं। फाल्गुन माह की पुरानी परंपराओं को याद करते हुए बुजुर्ग बताते हैं कि बसंत पंचमी के दिन होलिका दहन स्थल पर प्रतीकात्मक रूप से जाल रखा जाता था, जिसमें पांच गोबर के उपले और बेर की कांटेदार डाल शामिल होती थी। इसके बाद पूरे महीने गांव के लोग रोजमर्रा के कामकाज से निवृत्त होकर चौपाल पर इकट्ठा होते और ढोल-मजीरे की थाप पर फगुआ गीत गाते थे। यह सिलसिला फाल्गुन पूर्णिमा तक चलता था और होलिका दहन के बाद भी पखवारे भर होली मिलन कार्यक्रम आयोजित होते थे।
सिराथू क्षेत्र की 105 वर्षीय बुजुर्ग राजकुमारी बताती हैं कि होलिका दहन के दूसरे दिन आसपास के गांवों के लोग गाजा-बाजा के साथ होलिका स्थल पर पहुंचते, राख को सिर-माथे पर लगाते और वहीं से फाग गाते हुए काली माता के स्थान तक जाते थे। इसके बाद फगुआरों की टोली ढोल-मंजीरे के साथ गांव के घर-घर पहुंचती, एक-दूसरे को गुलाल-अबीर लगाकर गले मिलती और सालभर के गिले-शिकवे भुला देती थी। खोया भरी गुझिया खिलाकर खुले मन से उत्सव मनाया जाता था।
इसी क्षेत्र के सौ वर्षीय भूइयां प्रजापति का कहना है कि अब तो पता ही नहीं चलता कि होली कब आई और कब बीत गई। पहले महीने भर फगुआ गीत गूंजते थे, अब नई पीढ़ी मोबाइल पर गाने सुनकर त्योहार मना लेती है। उनका कहना है कि होली हिंदुओं का एक बड़ा पर्व माना जाता था और बाहर रहने वाले लोग भी इस अवसर पर गांव लौटकर परिवार व ग्रामवासियों के साथ उत्सव मनाते थे।
एक अन्य बुजुर्ग सत्यनारायण बताते हैं कि 80 के दशक से पूर्व आर्थिक तंगी के बावजूद उत्साह में कोई कमी नहीं थी। किसान सरसों, चना और मटर की फसल बिकने का इंतजार करते और उसी से होली का सामान, बच्चों के लिए नए कपड़े, रंग और पिचकारी खरीदते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद भाईचारा और आत्मीयता प्रबल थी।
बुजुर्गों का कहना है कि आज फगुआ गीतों की परंपरा लुप्तप्राय हो गई है और होली के रंगों की जगह कई स्थानों पर शराबखोरी का चलन बढ़ रहा है, जिससे सामाजिक संबंधों में दूरियां पैदा हो रही हैं। उनके अनुसार आवश्यकता है कि नई पीढ़ी पारंपरिक लोकगीतों और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाकर होली के वास्तविक संदेश सौहार्द, प्रेम और समरसता को पुनर्जीवित करें।
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