अमृतसर , जनवरी 14 -- मकर संक्रांति के पावन पर्व के विशेष अवसर पर देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं ने कड़ाके की ठंड के बावजूद श्री हरिमंदिर साहिब के पवित्र अमृत सरोवर में श्रद्धा की डुबकी लगाई।

मान्यता है कि माघी के दिन सरोवर में स्नान करने से आत्मिक शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है। कड़ाके की ठंड के बावजूद संगतों के उत्साह में कोई कमी नहीं देखी गई। श्री हरिमंदिर साहिब की परिक्रमा श्रद्धालुओं से पूरी तरह भरी रही। स्नान उपरांत संगतों ने गुरु घर में माथा टेका और गुरबाणी कीर्तन का रसपान किया। पूरे परिसर में 'बोले सो निहाल' के जयकारों की गूंज सुनाई देती रही। श्रद्धालुओं ने वाहेगुरु के समक्ष नतमस्तक होकर अपने परिवारों की सुख-शांति और समूची मानवता के कल्याण के लिए अरदास की।

माघी का यह दिन 40 मुक्तों की शहादत की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्होंने खिदराने दी ढाब (अब श्री मुक्तसर साहिब) में मुगल फौजों से लोहा लेते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। श्रद्धालुओं ने शहीदों को नमन करते हुए पवित्र सरोवर में श्रद्धा की डुबकी लगाई। श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रशासन और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से व्यापक प्रबंध किए गए थे। लंगर सेवा, पीने के पानी और चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था लगातार जारी रही।

मकर संक्रांति पर पंजाब के मुक्तसर में आज माघी मेला है। बैसाखी और बंदी छोड़ दिवस (दिवाली) के बाद इसे सिख धर्म का तीसरा सबसे बड़ा त्योहार मनाया जाता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु गुरुद्वारे में माथा टेकने आते हैं और सरोवर में डुबकी लगाते हैं।

इस मेले में सबसे चर्चित मुस्लिम नूरदीन की कब्र पर जूते-चप्पल मारने की परंपरा है। यहां आने वाले सिख श्रद्धालु श्री गुरू गोबिंद सिंह से धोखा करने के बदले मुस्लिम नूरदीन को सजा देते हैं। मेले के अंत में निहंग इसे बरछे से तोड़ देते हैं। हर साल इसे नया बनाया और तोड़ा जाता है।मुक्तसर का माघी मेला 40 मुक्तों यानी उन 40 सिखों की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने पहले तो श्री गुरू गोबिंद सिंह जी के लिए लड़ने से मना कर दिया। मगर, माई भागो की प्रेरणा से बाद में ऐसी लड़ाई लड़ी की अपनी जान भी कुर्बान कर दी।

नूरदीन को लेकर प्रचलित तीन मान्यताएं है मान्यताओं के अनुसार श्री गुरू गोबिंद सिंह जी दातुन कर रहे थे। उसी समय नूरदीन ने सिख का वेश बनाया और गुरुजी पर पीछे से हमला करने की कोशिश की। गुरुजी ने उसके हमले को नाकाम कर दिया और उसे पकड़ लिया। उसके बाद नूरदीन की मौत हो गई। दूसरी मान्यता ये है कि जब नूरदीन ने धोखे से गुरुजी पर वार करना चाहा तो गुरुजी ने उस पर गढ़वी यानि लोटे से वार कर दिया और उसे मार दिया। तीसरी मान्यता ये है कि गुरुजी ने उसे हमला करते हुए पकड़ा और फिर उसे ज्ञान दिया। जिसके बाद उसे आत्मग्लानि हुई। इसके बाद आघात होने से उसकी मौत हो गई। जिसे वहीं कुछ दूरी पर दफना दिया गया। उस स्थान पर अब गुरुद्वारा दातनसर है और गुरुद्वारे से कुछ ही दूरी पर मुगल नूरदीन की कब्र है। माघी मेले में आने वाले श्रद्धालु इस जगह पर भी जरूर जाते हैं। यहां वे नूरदीन की कब्र पर जूते मारने की प्रथा को जारी रखते हैं।

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